जापान के पास है उत्तराखंड की समस्याओं का जवाब
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जापान के तोकिहिको फ्यूजीमोटो ने शोध के जरिये दर्शित किया कि लघु योजनाएं उत्तराखंड के गांवों की तस्वीर बदल सकती हैं। उन्होंने उत्तराखंड की तरह ही 4275 की आबादी वाले पर्वतीय गोकेश गांव को चुना। पलायन के शिकार इस गांव में ज्यादातर बुजुर्ग बचे हैं।
रोजगार और शिक्षा के साधन नही हैं। युवा वर्ग गांव से पलायन कर रहा है। रोजगार के बेहद सीमित अवसर हैं और जन्म दर भी लगातार घट रही है।
यह गांव एक बड़े बांध के एक छोर पर स्थित था। माइक्रो परियोजना ने रोजगार के अवसर पैदा किए और गांव का आत्मविश्वास वापस लौटा है। पर इस परियोजना के साथ ही गांव में मनोरंजन, सामूहिक स्नान का स्थान, आईटी सेंटर, बर्थ सेंटर आदि का विकास भी किया गया।
मुख्यमंत्री आज होंगे कार्यशाला में शामिल
कार्यशाला में शनिवार को मुख्यमंत्री हरीश रावत भी दोपहर बाद शामिल होंगे। कार्यशाला में परियोजनाओं के सामने चुनौतियां, पर्यावरण एवं सामाजिक सरोकार, आपदाओं का परियोजनाओं पर प्रभाव विषय पर तकनीकी सत्र होंगे।
मछलियों को बचाने के लिए टरबाइन
जल विद्युत परियोजनाओं से होने वाले मछलियों को नुकसान का तोड़ खोजने की कोशिश हो रही है। एंट्र्जि हाइड्रो जैसी कंपनी तो बकायदा फिश फ्रेंडली टरबाइन भी बना चुकी है। कंपनी प्रतिनिधियों के मुताबिक उत्तर और दक्षिण अमेरिका की जल विद्युत परियोजनाओं में इस तरह की टरबाइन स्थापित भी की जा चुकी हैं।
हालांकि भारत से अभी इस तरह की मांग नहीं आई है। हालांकि यह भी है कि यह तकनीक लो हेड (कम उंचाई) वाली परियोजनाओं के लिए ही सफल साबित हुई है।
उत्तराखंड में महाशीर और ट्राउट हैं जिनके वजूद पर संकट है। बड़े बांधों में स्पिलवे और वाटर चैनल के जरिए मछलियों को बचाने की तकनीक का जिक्र किया गया। पर जर्मन कंपनी एंट्रिज हाइड्रो के प्रतिनिधि पंकज अग्रवाल के मुताबिक कंपनी ने कई देशों के नियमों को ध्यान में रखते हुए फिश फ्रेंडली टरबाइन भी विकसित की है।
हालांकि इसमें इस बात का भी ध्यान रखना होता है कि मछली कितने आकार की है और उसका व्यवहार क्या है। यह भी बताया गया कि टनल हेड के पास भारी एअर ब्लास्ट करके मछलियों को टरबाइन से दूर रखने का प्रयास भी किया गया।
...ताकि तेल न मिले पानी में
कई देशों में पानी में तेल का स्राव पूरी तरह से प्रतिबंधित है। तकनीकी विशेषज्ञों ने इसका भी समाधान खोजा है। कापलान तकनीक का जिक्र करते हुए पंकज अग्रवाल ने बताया कि परियोजनाओं में भारी संख्या में मशीनों का उपयोग होता है।
टरबाइन और अन्य मशीनों में बॉल बियरिंग और रोटर के बीच तेल का उपयोग होता है। रनर में इस तेल की मात्रा 40 टन तक हो सकती है। ऐसे में रनर से तेल के स्राव का खतरा भी रहता है।
इसके लिए ऐसा रनर भी इजाद किया गया है जिसमें तेल की जगह पानी का इस्तेमाल ल्यूब्रिकेंट के रूप में इस्तेमाल किया गया। पानी की अपनी विशेषता को देखते हुए इसमें एक निर्धारित मात्रा में लेमन ऐसिड मिलाया जाता है।