अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2018: 21 जून को विश्व पटल पर चमकेगा उत्तराखंड, मिलेगी अलग पहचान
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 21 जून को जब देहरादून में करीब 60 हजार प्रतिभागियों के साथ योग करेंगे तो विश्व पटल पर हिमालय राज्य उत्तराखंड को अलग पहचान मिलेगी। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून को योग दिवस के मुख्य समारोह के लिए चुना गया है। सभी पहलुओं की अमर उजाला के प्रमुख संवाददाता बिपिन बनियाल और मुख्य संवाददाता राकेश खंडूड़ी ने पड़ताल की। पेश है एक रिपोर्ट:-
अब तक जिन राज्यों में मुख्य समारोह हो चुके हैं, उनमें उत्तराखंड सबसे छोटा राज्य है। सबसे पहला योग दिवस का मुख्य समारोह वर्ष 2015 में नई दिल्ली स्थित राजपथ पर हुआ था। वर्ष 2016 में मुख्य समारोह के लिए पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ को चुना गया। तीसरे योग दिवस का मुख्य समारोह उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में हुआ। अब उत्तराखंड को चौथे योग दिवस के मुख्य समारोह के लिए चुना गया है।
करीब 53483 वर्ग किमी क्षेत्रफल वाले उत्तराखंड को ऋषि मुनियों की तपस्थली के तौर पर देखा जाता है। योग और आध्यात्म देवभूमि की विरासत है। ऋषिकेश, हरिद्वार, उत्तरकाशी में योग, अध्यात्म और आयुष परंपरा सदियों से चली आ रही है। जानकारों का मानना है कि योग दिवस के महा आयोजन का पूरी दुनिया में सीधा प्रसारण होगा। इसके जरिये दुनिया के करीब 193 राष्ट्र, जो संयुक्त राष्ट्र महासभा के सदस्य हैं, उत्तराखंड की योग परंपरा को जान सकेंगे। देश-दुनिया के लोगों को मालूम हो सकेगा कि सवा करोड़ की जनसंख्या वाला उत्तराखंड जो जनसंख्या घनत्व के मामले में देश में 25 वें स्थान पर है, वो योग और आध्यात्म की भी अनूठी स्थली है।
उत्तराखंडियों का ऊंचे ओहदों पर जाने का संयोग
थल सेना अध्यक्ष जनरल विपिन रावत, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत, सेंसर बोर्ड के चेयरमैन प्रसून जोशी। देश के प्रतिष्ठित ओहदों पर काबिज ये सभी हस्तियां संयोग से उत्तराखंड मूल की हैं। दूसरा, इत्तेफाक यह है कि इतनी बड़ी तादाद में उत्तराखंड मूल की मेधा को शीर्ष ओहदों की जिम्मेदारी मोदी राज में ही मिली है। इसे उनकी जीवटता, निष्ठा और पुरुषार्थ के पुरस्कार के तौर पर देखा गया है।
लेकिन कहीं न कहीं यह बात भी जुड़ी कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उत्तराखंड से पुराने आत्मिक लगाव का भी परिणाम है। उत्तरप्रदेश सरीखे बड़े और अहम राज्य की बागडोर उत्तराखंड मूल के योगी आदित्यनाथ को सौंपना भी इस संयोग की एक प्रमुख नजीर है। केंद्र की सत्ता में भाजपा की सरकार आने के बाद से बहुत बड़ी संख्या में उत्तराखंड मूल के नौकरशाहों, सैन्य अफसरों और इंजीनियरों, कलाकारों को कई अहम जिम्मेदारियों के लिए चुना गया। यह उत्तराखंड के लिए गौरव की बात है कि देश की सेना की कमान उत्तराखंड के मूल निवासी जनरल विपिन रावत के हाथों में है। एयर इंडिया के चेयरमैन एवं एमडी का दायित्व उत्तराखंडी प्रदीप सिंह खरोला देख रहे हैं। रेलवे बोर्ड की कमान अश्वनी लोहनी के हाथों में है, जिनकी जड़ें उत्तराखंड में हैं। उत्तराखंड मूल के ही एडमिरल (रि.) डीके जोशी अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के लेफ्टिनेंट गवर्नर हैं।
मोदी का योग या सियासी संयोग
21 जून को महज सवा करोड़ की आबादी वाला उत्तराखंड दुनिया के नक्शे पर आकर्षण का केंद्र होगा। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के लिए चुने गए देहरादून में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उत्तराखंड वासियों के साथ योग करना सामान्य घटना नहीं है। पर्यटन और धार्मिक आस्था के प्रतीक उत्तराखंड में यह आयोजन जहां योग और आध्यात्म के क्षेत्र में अलग पहचान दिलाने में मददगार साबित होगा, वहीं देवभूमि के अनूठे पक्ष से समूचा विश्व भी रूबरू हो सकेगा।
इन संभावनाओं और संदेशों के बीच कुछ सवाल भी हैं, जो देवभूमि के प्रति मोदी के लगाव से जुड़े हैं। संघर्ष के दिनों में मोदी की तपस्थली माने जाने वाले उत्तराखंड में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस कराने को लेकर उनके समर्थक चाहे जो तर्क दें, लेकिन जानकार मोदी के इस योग में सियासी संयोग भी टटोल रहे हैं। आखिर पूरी दुनिया को योग के जरिये स्वस्थ रहने का संदेश देने के लिए देहरादून को ही क्यों चुना और यह आयोजन उत्तराखंड को वैश्विक पहचान दिलाने में किस तरह से मददगार होगा।
सियासी संयोग
उत्तराखंड में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के आयोजन के सियासी निहितार्थ क्या हो सकते हैं? यह सवाल सियासी हलकों में गरमा रहा है। राजनीतिक महत्व की दृष्टि से यूपी, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश या राजस्थान जैसे राज्य उत्तराखंड की तुलना में खासे बड़े और ज्यादा संभावनाओं वाले हैं। राजस्थान, उड़ीसा और मध्यप्रदेश में तो विधानसभा के चुनाव भी होने हैं। प्रधानमंत्री मोदी के लिए इन राज्यों में से किसी एक शहर को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के लिए चुना जाना ज्यादा मुफीद हो सकता था। फि र इस महाआयोजन की मेजबानी का अवसर उत्तराखंड को ही क्यों मिला?
सियासी जानकार इसे देश की राजनीति में बने नए समीकरणों से जोड़ रहे हैं। उनका मानना है कि मोदी सरकार के खिलाफ बने विरोधी दलों का गठबंधन देश की सियासत में एक नया मुहावरा गढ़ने जा रहा है। उनके हिसाब से देश की राजनीतिक परिस्थितियां बदली हैं। अब राजनीति की पिच भाजपा के लिए उतनी आसान नहीं रह गई है । वर्ष 2014 में मोदी की कप्तानी में भाजपा ने जितनी सहजता के साथ खेला था, चार सालों में सियासी पिच का मिजाज बदल गया है। अब भाजपा के लिए पिच उतनी आसान नहीं रह गई है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी दलों की गोलबंदी ने भाजपा के लिए बड़ी मुश्किल पैदा की है। उत्तराखंड में लोकसभा की बेशक पांच सीटें हैं। लेकिन बदले हालात में एक-एक सीट का महत्व है। उनका तर्क है कि बेशक यह कार्यक्रम गैर राजनीतिक है, लेकिन इसका प्रभाव राजनीतिक होगा। यानी मोदी के देहरादून आने का असर सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं बल्कि पश्चिमी उत्तरप्रदेश और हिमाचल प्रदेश पर भी होगा। पर्वतीय राज्य को तरजीह देने का संदेश उत्तर पूर्व के हिमालयी राज्यों तक पहुंचाने की भी कोशिश है। हालांकि प्रदेश भाजपा मोदी के योग में सियासी संयोग से साफ इंकार कर रही है।
‘योग दिवस को राजनीति से जोड़ने का कोई औचित्य नहीं है। ये किसी दल, जाति, धर्म से जुड़ा आयोजन नहीं है। इसमें हर सियासी दल को शिरकत करनी चाहिए। यह विशुद्ध रूप से स्वास्थ्य से जुड़ा विषय है, जिसे मोदी जी ने विश्व पटल पर पहचान दिलाई है।
- अजय भट्ट, प्रदेश अध्यक्ष, भाजपा
‘मोदी योग’ से कांग्रेस खेमे में ‘कपालभाति’
चुनावी चुनौती से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आना भाजपाइयों में जहां उत्साह का नया संचार कर रहा है, वहीं कांग्रेस की स्थिति एकदम उलटी है। कुछ स्टाइल में कहें तो ‘मोदी योग’ कांग्रेस को ‘कपालभाति’ करा रहा है। भाजपा की संगठनात्मक सक्रियता का अब भी कांग्रेस को कोई तोड़ नजर नहीं आ रहा है। भले ही योग के इस कार्यक्रम से मोदी पूरे देश में अलग तरह का संदेश देना चाहते हों, लेकिन उत्तराखंड भाजपा के लिए उनका संदेश पहले से जाहिर है। यह संदेश लोकसभा और निकाय चुनाव के लिए तैयारियों को चरम पर पहुंचाने से जुड़ा है। कांग्रेस इस स्थिति से ही परेशान है। आने वाले दिनों में बड़े नेताओं की मौजूदगी में बड़ा कार्यक्रम करने का दबाव अब उसके सिर पर आ गया है।
मोदी के आने से ये सवाल उठ रहे हैं कि एक छोटे से राज्य में आकर आखिर वह क्या ‘सियासी हित’ साधना चाहते हैं। यहां से लोकसभा की सिर्फ पांच सीटें हैं। मगर माना ये जा रहा है कि उत्तराखंड में मिला प्रचंड बहुमत मोदी के जेहन में ताजा है। वह उत्तराखंड में सक्रियता से यह संदेश बार-बार देना चाहते हैं कि देवभूमि के जनादेश के लिए वह आभारी हैं। साथ ही उन्हें 2019 में भी इसी तरह के जनादेश की अपेक्षा है, जब लोकसभा की एक-एक सीट कसौटी पर होगी। भाजपा हाईकमान मोदी के कार्यक्रम से उत्तराखंड इकाई के खासे सक्रिय होने की उम्मीद भी कर रहा है। इस बात को समझते हुए कांग्रेसी खेमे में बेचैनी है। कांग्रेस को यह समझ में नहीं आ रहा कि वह योग दिवस पर मोदी के कार्यक्रम का काउंटर किस तरह से करे। इन स्थितियों ने उसे जल्द से जल्द बडे़ कार्यक्रम के आयोजन के लिए दबाव में जरूर ला दिया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी योग के लिए उत्तराखंड में आ रहे हैं। हम स्वागत करेंगे। मगर योग जब मोदी या रामदेव कराए। तब ही होगा, ऐसी बात नहीं है। मैं इस मौके पर कहना चाहूंगा कि उत्तराखंड में मोदी आ रहे हैं तो वह यहां के लिए कुछ तोहफे भी जरूर दें। किसानों की कर्ज माफी की जो बात पूर्व में उन्होंने की थी। उस पर अमल होना चाहिए।
-प्रीतम सिंह, प्रदेश अध्यक्ष, कांग्रेस
गुजरात के बाद उत्तराखंड में ‘मोदी मॉडल’
11 हिमालयी राज्यों में उत्तराखंड पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे ज्यादा नजरें इनायत हैं। वजह हैं, छोटे से उत्तराखंड में हर वो बड़ी खूबी मौजूद है, जो भाजपा के एजेंडे के अनुरूप मानी जा सकती है। यहां पर हिंदुत्व के एजेंडे लायक सब कुछ है। चारधाम हैं, मठ-मंदिर हैं तो गंगा-यमुना का उद्गम भी है। अध्यात्म, संस्कृति के लिहाज से भी उत्तराखंड की भूमि बेहद उर्वरा मानी जाती है। इसके अलावा, एक वजह और है जो उत्तराखंड से मोदी कनेक्शन की बात को और पुख्ता ढंग से उभारता है। वह ये कि इस छोटे से राज्य से अवस्थापना विकास का प्रभावी संदेश किसी भी अन्य राज्य के मुकाबले दिया जाना ज्यादा सरल है। माना जा रहा है कि ये ही वजह है जो बार-बार मोदी को उत्तराखंड खींच कर ला रहीं है।
उत्तराखंड में भाजपा की सरकार के काबिज होने के बाद चारधाम आलवेदर रोड महाप्रोजेक्ट शुरू किया गया है। यह प्रोजेक्ट जिस तरह से आगे बढ़ रहा है, वह आने वाले समय में उत्तराखंड की तस्वीर बदलने में मददगार साबित होगा। देश-दुनिया से आने वाले यात्रियों को विकास की सशक्त झलक सरकार आलवेदर रोड के जरिये दिखाएगी। इसके अलावा रेल प्रोजेक्ट पर मोदी सरकार की दिलचस्पी सबके सामने है। हालांकि यह प्रोजेक्ट कांग्रेस सरकार के जमाने से शुरू हुआ है। लेकिन भूमि अधिग्रहण से लेकर अन्य मामलों में तेजी मोदी सरकार के जमाने में आई है। इसी तरह भारतमाला प्रोजेक्ट के तहत उत्तराखंड में नई सड़कों के जरिये सरकार दिखाना चाहती है कि अवस्थापना विकास कैसे होता है। 2013 में आपदा का शिकार हुए केदारनाथ क्षेत्र में पुनर्निर्माण के कार्य की प्रधानमंत्री खुद मॉनीटरिंग कर रहे हैं। इन स्थितियों के बीच केदारनाथ पुनर्निर्माण से सरकार के दोनों तरह के मकसद पूरे हो रहे हैं। करोड़ों हिंदुओं की आस्था के केंद्र केदारनाथ को भव्य स्वरूप में लाकर जहां सरकार हिंदुत्व के एजेंडे को खाद-पानी दे रही है, वहीं त्रासदी के बाद अवस्थापना विकास का एक बेहतर नमूना भी पेश करना चाहती है।