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जैव विविधता दिवस : कई वन्यजीवों पर मंडरा रहा संकट, केरल के बाद उत्तराखंड पर सबसे बड़ा खतरा

Sat, 22 May 2021 02:04 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal अरविंद सिंह, अमर उजाला, देहरादून
अरविंद सिंह, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sat, 22 May 2021 02:04 PM IST
सार

केंद्रीय वन, पर्यावरण जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक केरल के बाद उत्तराखंड की जैव विविधता पर सबसे बड़ा खतरा है।

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International Day for Biological Diversity 2021 : many wildlife endangered in uttarakhand
Tiger Reserve - फोटो : pixabay

विस्तार

वन्यजीवों के शिकार के साथ ही उनके प्राकृतिक आवासों में कमी, पर्यावरण में आए बदलाव, आपदाओं, जलवायु परिवर्तन और तेजी से हो रहे शहरीकरण का पूरी दुनिया में जैव विविधता पर विपरीत असर पड़ रहा है। इससे उत्तराखंड भी अछूता नहीं है।

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विश्व जैव विविधता दिवस 2021 : उत्तराखंड में अतीस, वन ककड़ी समेत कई वनस्पतियां संकट में
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जैव विविधता के संरक्षण को लेकर काम कर रहे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों का मानना है कि यही स्थिति रही तो 2050 तक दुनिया में जैव विविधता का एक तिहाई हिस्सा खत्म हो जाएगा। उत्तराखंड विज्ञान एवं तकनीकी परिषद की रिपोर्ट के अनुसार राज्य में सूक्ष्म जीवों की 1496, पौधों की 6598, औषधीय वनस्पतियों की 2575 और जंतुओं की 2551 प्रजातियां हैं। इनमें से पौधों की 35, औषधीय वनस्पतियों की 64 और जंतुओं की 41 प्रजातियां संकटग्रस्त श्रेणी में शामिल हैं।
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केंद्रीय वन, पर्यावरण जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक केरल के बाद उत्तराखंड की जैव विविधता पर सबसे बड़ा खतरा है। उत्तराखंड में वन्यजीवों की 15 और पादप की 16 ऐसी प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार राज्य में बारहसिंघा, भूरा भालू, कस्तूरी मृग, स्लॉथ बियर के साथ ही सफेद पीठ वाले गिद्ध, लाल सिर वाले गिद्ध, ऊदबिलाव, माउंटेन क्वायल की संख्या बेहद कम बची है।

राज्य में मात्र 811 चील बचे हैं, जो कभी बहुतायत में पाए जाते थे। वहीं, पूरे राज्य में सिर्फ 313 पांडा बचे हैं। कुछ संस्थाओं की रिपोर्ट के अनुसार 450 प्रजातियों पर विलुप्त होने का खतरा है। इनमें 150 स्तनधारी जीव और पक्षियों की 150 प्रजातियां भी शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक कीटों की कई प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं।

वनस्पतियों की कई प्रजातियों पर खतरा

भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के क्षेत्रीय प्रभारी व वनस्पति विज्ञानी डॉ. एसके सिंह के मुताबिक भारत में वनस्पतियों की 60000 से अधिक प्रजातियां हैं। इसमें 18500 फूल वाले पौधों के साथ ही 14000 फंगस और 1200 के करीब फर्न की प्रजातियां हैं। ब्रायोफिट्स की संख्या 250 के आसपास है। लेकिन 40 फीसदी प्रजातियों पर संकट मंडरा रहा है। पर्यावरण में आए बदलाव और वनों के अत्यधिक दोहन से जैव विविधता प्रभावित हो रही है।

संरक्षण के लिए चल रहे कई कार्यक्रम
कस्तूरी मृग, स्नो लेपर्ड और बाघों के संरक्षण के लिए कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। कस्तूरी मृग के संरक्षण के लिए महरूड़ी में कस्तूरी मृग अनुसंधान केंद्र के साथ ही चमोली के कंचला में कस्तूरी मृग फार्म स्थापित किया गया है। पिथौरागढ़ के अस्कोट में भी कस्तूरी मृग अभ्यारण की स्थापना की गई है। वहीं, वर्ष 1990 से ही स्नो लेपर्ड योजना के साथ टाइगर वाच योजना चल रही है।

राज्य में बनेंगी 10 बायो डायवर्सिटी हेरिटेज साइट्स 
राज्य सरकार, वन विभाग और जैव विविधता बोर्ड की ओर से पूरे राज्य में 10 जगहों पर बायो डायवर्सिटी हेरीटेज साइट्स का निर्माण किया जाएगा। फिलहाल पहले चरण में पिथौरागढ़ के थलकेदार और टिहरी के देवलसारी क्षेत्र में जैव विविधता हेरिटेज साइट्स को बनाने की प्रक्रिया जारी है।

राज्य में जैव विविधता के संरक्षण के लिए पीपल डायवर्सिटी रजिस्टर (पीबीआर) तैयार किया जा रहा है। इसमें जैव विविधता से जुड़ी सभी प्रजातियों को शामिल किया जाएगा। बायो डायवर्सिटी मैनेजमेंट कमेटी (बीएमसी) की मदद से पीबीआर तैयार करने के बाद जैव विविधता के संरक्षण को लेकर तमाम योजनाएं बनाई जाएंगी। 
-विनोद सिंघल, अध्यक्ष, उत्तराखंड जैव विविधता संरक्षण बोर्ड

सरकार, जैव विविधता बोर्ड और वन विभाग मिलकर काम कर रहे हैं। जैव विविधता को संरक्षित करने में आमजन की अधिक से अधिक भागीदारी हो इस पर भी काम किया जा रहा है। जैव विविधता को संरक्षित करने को लेकर हर संभव कदम उठाए गए हैं।
-राजीव भरतरी, प्रमुख वन संरक्षक, उत्तराखंड

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