उत्तराखंडः पहाड़ की सेवा में बन बए ‘पहाड़ी’
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पहाड़ से ही पहाड़ के बाशिंदों का पलायन, दुर्गम से दूरी बनाकर सुगम में की हर संभव जुगाड़बाजी जैसी खबरों के बीच जब यह पता लगता है कि दो मैदानी लोगों ने पहाड़ की सेवा में खुद को ‘पहाड़ी’ बना लिया तो उनके जज्बे की सराहना किए बिना नहीं रह सकते।
चिकित्सकों को भगवान का दर्जा प्राप्त है। लेकिन देवभूमि उत्तराखंड की विडंबना यह है पहाड़ से यह भगवान हर संभव दूरी बनाने का जतन करता है। लेकिन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कर्णप्रयाग में तैनात डॉ. राजीव शर्मा जरा अलग हटकर हैं। मैदानी क्षेत्र और प्रदेश कैडर भिन्न होने के बावजूद 23 वर्षों से पहाड़ों में सेवाएं दे रहे हैं।
एमबीबीएस और एमएस की डिग्री लेने के बाद वर्ष 1992 में डॉ. राजीव शर्मा की तैनाती सर्जन के पद पर सीएचसी कर्णप्रयाग में हुई। तब से लेकर वहा यहीं जमे हैं। इस अरसे में पहाड़ इतना लगाव हो गया कि कर्णप्रयाग के कालेश्वर में ही भूमि खरीद ली। अब खुद को पहाड़ का ही बताते हैं।
डॉ. राजीव शर्मा बताते हैं कि यदि सरकारी चिकित्सक पहाड़ में सेवा नहीं देते तो प्राइवेट अस्पताल खोलने वालों को प्रेरित करना चाहिए, जिससे लोगों को सुविधा मिल सके। सीएमओ डॉ. एके गैरोला भी डॉ. शर्मा की सेवाओं की सराहना करते हैं। डॉ. शर्मा को अपने जज्बे के लिए सम्मान भी मिले हैं। जी मीडिया की ओर से पिछले 22 मार्च को देवभूमि सम्मान से भी नवाजा।
मैदानी होने के बावजूद डॉ. शर्मा बरसों से अपनी सेवाएं पहाड़ में दे रहे हैं। ऐसे लोग अन्य के लिए प्रेरणास्रोत हैं।
- भुवन नौटियाल, संयोजक श्रीनंदा देवी राजजात विकास परिषद
सेवा का जज्बा इस मैदानी शिक्षक से सीखिए
रमेश जोशी/ अमर उजाला, थराली
आठ फरवरी 1984 को सिरसका (सहारनपुर) निवासी सोमप्रकाश ने जब पहली बार शिक्षा विभाग में नियुक्ति ली तब उन्होंने सोचा भी न होगा कि जिंदगी इन्हीं पहाड़ों के दुर्गम विद्यालयों में कट जाएगी।
बकौल सोमप्रकाश पहाड़ के स्वच्छ वातावरण ने कभी 9 से 13 किमी की खड़ी चढ़ाई को मुसीबत नहीं बनने दिया, वह भी तब जब उनके पैरों में तकलीफ हुई। सोमप्रकाश छह दुर्गम विद्यालयों में तैनात रहे और 31 मार्च 2015 को राजकीय जूनियर हाईस्कूल गैराबारम से रिटायर हो गए।
सोमप्रकाश ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि उनकी पहली नियुक्ति नारायणबगड़ ब्लाक के प्राथमिक विद्यालय भगोती में हुई। आज भले ही भगोती में सड़क सुविधा हो लेकिन तब भगोती के लिए नारायणबगड़ से 14 किमी पैदल चलना पड़ता था।
कुछ वर्षों बाद उनका स्थानांतरण कुलसारी से 15 किमी की पैदल दूरी पर स्थित प्राथमिक विद्यालय रेई कर दिया गया। इस दौरान उनके पैर में पैरालिसिस का हल्का अटैक हुआ, लेकिन 8 दिनों में फिर से चलने फिरने लगे। इसके बाद जहां भी ट्रांसफार्मर हुआ दुर्गम में ही स्कूल मिला।
पदोन्नति में भी दुर्गम विद्यालय जूनियर हाईस्कूल गैरबारम मिला। कुलसारी से 9 किमी की पैदल दूरी चढ़ने के दौरान फिर उनके पैर में दिक्कत हुई। सोमप्रकाश जूनियर स्तर पर हिंदी और संस्कृत पढ़ाते थे। उनका परिवार सहारनपुर में ही रहता है। ग्रामीण मंगल सिंह और शिक्षक जसपाल राज ने कहा कि सोमप्रकाश के लिए अध्यापन कार्य में पहाड़ और मैदान का कभी फर्क नहीं रहा।