आखिर चीन को ‘साधने’ की सड़क बने तो कैसे?
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नाराज माने जा रहे चीन को साधने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चीन दौरा प्रस्तावित है, इसी दौरान जहां चीन से सीमांत विवाद पर चर्चा की भी संभावना है। वहीं आधारभूत संरचनाओं पर भी वार्ता हो सकती है।
ऐसे में एक सवाल खड़ा हो गया है कि चीन को ‘साधने’ की सड़क बने तो कैसे। यह सर्वविदित है कि चीन भारत सीमा के साथ अपने सैन्य ढांचे के साथ ही नागरिक सुविधाओं का मजबूत ढांचा खड़ा कर चुका है और लगातार इस दिशा में आगे बढ़ रहा है।
वहीं दूसरी ओर भारत में अभी तक चीन सीमा तक सड़कें ही नहीं पहुंच पाई हैं। चीन सीमा तक सड़कों को पहुंचाने के लिए सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के सामने ऐसी कई दिक्कतें हैं जिनका हल अभी तक निकलता नहीं दिख रहा है और चीन सीमा पर लगातार सड़क निर्माण में देरी हो रही है। हाल ही में प्रधानमंत्री कार्यालय भी इस मामले में सीधा दखल दे चुका है, लेकिन इंतजार इस बात है कि समस्या का हल कब और कैसे हो।
आधारभूत ढांचे के लिए सड़कें ही अहम कड़ी
उल्लेखनीय है कि चीन सीमा से लगते राज्यों में प्रस्तावित 61 सामरिक महत्व की सड़कों से अब तक केवल 17 पूरी हुई हैं। बाकी 44 सड़कें वन, भूमि और निर्माण सामग्री के चलते लटकी हुई हैं। चीन सीमा पर सशक्त आधारभूत ढांचे के लिए सड़कें ही अहम कड़ी हैं और इसी अहम कड़ी की राह बनती नहीं दिख रही।
इसके चलते करीब एक सप्ताह पहले प्रधानमंत्री कार्यालय ने उत्तराखंड सहित चीन सीमा से जुड़े अन्य राज्यों के अधिकारियों की बैठक तक बुलाई। इसमें सामने आया कि सड़कों के निर्माण के लिए जिम्मेदार बीआरओ की कुछ अहम दिक्कतें हैं। इसमें निर्माण सामग्री की उपलब्धता, भूमि अर्जन में देरी के साथ वन विभाग की अनुमति में देरी मुख्य समस्याएं हैं।
निर्माण सामग्री और भूमि अर्जन के लिए बीआरओ को राज्यों से ही दिक्कत हो रही है। खनन के लिए पर्यावरण प्रभाव अध्ययन की अनिवार्यता, नदी तल वन क्षेत्र में आने से वन एवं पर्यावरण की अनुमति न मिलना भी बीआरओ के लिए समस्या बन रहा है।
डोभाल की चीनी समकक्ष के साथ बैठक जल्द
भारत चीन के साथ बेहतर संबंध बनाने और सीमांत मुद्दों के समाधान की पहल कर रहा है। इस माह के आखिर में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल चीनी समकक्ष के साथ बैठक करने वाले हैं। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चीन दौरा प्रस्तावित है।
केंद्र, राज्यों में समन्वय की कमी से भी दिक्कतें
सीमांत सड़कों में देरी की मुख्य वजह केंद्र और राज्यों में समन्वय की कमी है। राज्यों में नदियों से रोड़ी, पत्थर उठान के लिए खदानों की राज्य स्तर से अनुमति नहीं मिल रही। उत्तराखंड ने पीएमओ में हुई बैठक के बाद बीआरओ को आ रही दिक्कतों पर राज्य के रुख का ड्राफ्ट तैयार कर लिया है।
राज्य ने बैठक में भी केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और खनन मंत्रालय के नियमों में लचीलापन लाने का मुद्दा उठाया था। उत्तराखंड ने अब पीएमओ को सुझाव दिया है कि खनन मंत्रालय से चुगान और खनन के अंतर को स्पष्ट करने के लिए एक्ट में बदलाव जरूरी है। नदी तल क्षेत्र को वन विभाग से बाहर करने के लिए एक्ट में केंद्र को संशोधन करना होगा।