जान हथेली पर रखकर आवागमन करते हैं चीन सीमा के लोग

कालिका रावल/ अमर उजाला, पिथौरागढ़ Updated Sun, 20 Aug 2017 01:27 PM IST
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दशकों से आपदा का दंश झेल रहे चीन और नेपाल से सटे पिथौरागढ़ जिले के सीमा पर रहने वाले लोग बेहद कठिनाइयों में जीवन व्यतीत करते हैं। मुनस्यारी तहसील के चीन की सीमा से सटे इलाकों में रहने वाले लोगों की राह देश की आजादी के सात दशक बाद भी आसान नहीं हुई है। यातायात सुविधा से वंचित इन इलाकों के लोग जान हथेली पर रखकर आवागमन करते हैं। इस आधुनिक दौर में भी इन क्षेत्रों में घोड़े, खच्चर ही मालवाहक का काम करते हैं।

समुद्र तल से 3424 मीटर की ऊंचाई पर चीन सीमा से सटा मिलम माइग्रेशन गांव है। इस गांव में अप्रैल से सितंबर तक ही लोग रहते हैं। उच्च हिमालयी क्षेत्र के इस गांव के लोग अक्तूबर से गर्म घाटी में उतर जाते हैं। मिलम जाने वाला रास्ता बेहद खतरनाक है। मुनस्यारी से 57 किमी की पैदल दूरी पर स्थित मिलम जाना खतरों से खाली नहीं है।

इस रास्ते का उपयोग मिलम के साथ ही पाछू, रिलकोट, गनघर, लास्पा, बोगड्यार आदि गांवों के लोग करते हैं। मुनस्यारी से 17 किमी की पैदल दूरी पर मालछ्यू और तालछ्यू झरने से होकर पैदल रास्ता गुजरता है। इस स्थान पर आवाजाही करते समय जीवन दांव पर होता है। झरने का पानी करीब 500 मीटर नीचे खाई में गिरता है। थोड़ी सी असावधानी से जीवन खतरे में पड़ सकता है। झरने से बचाव के लिए लोनिवि ने टिन की चादरें लगा रखी हैं। कई बार लोग इस झरने से गिरकर चोटिल हो चुके हैं।

लोनिवि के अधीन इस रास्ते पर नैनसिंह टॉप, रलगाड़ी समेत कई स्थान बेहद खतरनाक हैं। नैनसिंह टॉप में तो रास्ता इतना खतरनाक है कि सामान ढोने वाले घोड़े-खच्चरों की पूछ पकड़कर उनको संभालना पड़ता है। मिलम में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस की चौकी है। आईटीबीपी जवानों को भी पैदल रास्ते की दिक्कतों से दो-चार होना पड़ता है। मुनस्यारी के सामाजिक कार्यकर्ता हीरा चिराल कहते हैं कि असुविधाओं के चलते मिलम क्षेत्र के गांव धीरे-धीरे खाली हो रहे हैं। इन गांवों में कभी 250 परिवार रहते थे। अब 150 लोग भी नहीं रहते।

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