आखिर भारत में कई गांवों के लोग क्यों खा रहे चीन का राशन? सामने आया चौंकाने वाला सच
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भारत में कई गांव के लोग चीन का राशन खा रहे हैं। इसे लेकर जो बातें सामने आई हैं उससे सरकार की भी टेंशन बढ़ जाएगी। उत्तराखंड में तिब्बत सीमा से सटे करीब छह गांवों में लोग चीन का राशन, रिफाइंड, सब्जियां-मसाले और नमक खा रहे हैं। ये वस्तुएं चीन के जरिये नेपाल के छांगरु तिंकर के रास्ते भारत पहुंच रही हैं। नजंग के आगे रास्ता बंद होने की वजह से सीमांत के इन गांवों में भारत से जरूरी सामान नहीं पहुंच पा रहा है। यही वजह है कि इन गांवों के लोग नेपाल जाकर अपनी जरूरत का सामान ला रहे हैं।
गर्ब्यांग, गुंजी, नपल्चू, नाभि, रौंककौंग, कुटी आदि गांव तिब्बत सीमा से सटे हुए हैं। इन गांवों में 350-400 परिवार रहते हैं। कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग के इन गांवों में धारचूला से खाने-पीने की वस्तुओं की आपूर्ति होती है। धारचूला से 100-105 किमी दूरी पर बसे इन गांवों में घोड़े, खच्चर से माल पहुंचाया जाता है। इस समय धारचूला से गुंजी तक निर्माणाधीन सड़क के लिए पहाड़ काटे जा रहे हैं।
धारचूला से 56 किमी दूर गर्बाधार के आगे ब्लास्टिंग के चलते पहाड़ों से मलबा, बोल्डर गिरने का डर है। इस वजह से घोड़े, खच्चर इन रास्तों पर नहीं जा रहे हैं। इस कारण सीमांत गांवों में खाने-पीने की वस्तुएं नहीं पहुंच पा रही हैं। ऐसे में ये ग्रामीण सीतापुल से नेपाल के छांगरु तिंकर पहुंच कर वहां से चीन का रिफाइंड, चावल, सब्जियां, मसाला आदि ला रहे हैं।
चीन की वस्तुओं की कीमत स्युगर में
वस्तु चीन का रुपया भारत का रुपया
नमक का पैकेट 10 स्युगर 110 रुपये
रिफाइंड पांच लीटर 70-80 स्युगर 770-880 रुपये
चावल 10 किलो 55-65 स्युगर 605- 715 रुपये
नोट - चीन की मुद्रा युआन को स्थानीय भाषा में ग्रामीण स्युगर कहते हैं। एक स्युगर की कीमत करीब 11 रुपये आंकी जाती है।
केंद्र और प्रदेश सरकार भारत के आखिरी गांव में खाद्य सामग्री उपलब्ध नहीं करा पा रही हैं। लोग नेपाल के माध्यम से चीन से आने वाला चावल, तेल, मसाले खाने को मजबूर हैं। सरकार को हमारे बारे में भी सोचना चाहिए।
- गुलाब सिंह, प्रधानपति, कुटी, भारत का अंतिम गांव
नजंग के आगे रास्ता बंद होने से माल नहीं पहुंच पा रहा है। हमारी विशेष पूजा पद्धति होती है, इसमें पूरे गांव को दावत देनी होती है। ऐसे में हम लोगों को नेपाल से रसद खरीद कर लानी पड़ती है। सरकार हमको पर्याप्त खाद्य वस्तुएं दे तो नेपाल पर निर्भरता खत्म हो जाएगी।
-कृष्णा गर्ब्याल, अध्यक्ष रं संस्था (भारत और नेपाल की जनजातियों की संयुक्त संस्था)
सरकारी अफसर-कर्मचारियों के हैं ये गांव
गुंजी के लिए रास्ता बंद होने की वजह से राशन नहीं पहुंच पाया। ऊपर के गांवों में हेलीकॉप्टर से राशन पहुंचाया गया है। पीडीएस सिस्टम से भी हर गांव में चावल आदि पहुंचा दिया गया है।
-राजकुमार पांडे, अंतरराष्ट्रीय भारत चीन एवं व्यापार पर्यटन अधिकारी/एसडीएम धारचूला
सरकारी अफसर-कर्मचारियों के हैं ये गांव
तिब्बत सीमा से सटे ये गांव सरकारी अफसरों और कर्मियों के हैं। गर्ब्यांग गांव से कई आईएएस, पीसीएस अफसर निकले हैं। कई अफसर रिटायर हो चुके हैं। यहां के तमाम लोग अब भी शासन में उच्च पदों पर कार्यरत हैं।
नेपाल के रास्ते भारत में घुसपैठ कर रहा है चीन
स्थानीय लोग नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि चीन बेहद कूटनीतिक ढंग से भारत में घुसपैठ कर रहा है। चीन अपनी वस्तुओं को नेपाल पहुंचा रहा है फिर नेपाल से ये वस्तुएं भारत में पहुंच रहीं हैं।
इस तरह चीन भारत के लोगों को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश कर रहा है। दरअसल, चीन और नेपाल मित्र राष्ट्र हैं। नेपाल से चीन में आवाजाही पर कोई रोक नहीं है। ऐसे में चीन सीमा पर सटे नेपाल के गांव के लोग चीन से जरूरी वस्तुएं खरीदते हैं। इधर नेपाल और भारत के बीच भी आवाजाही पर रोक नहीं है। नेपाल के लोग चीन से खरीदा हुआ सामान भारत में पहुंचा देते हैं।
दो-तीन दिन लगते हैं रसद पहुंचने में
धारचूला से रसद पहुंचने में भी दो-तीन दिन लगते हैं। धारचूला से माल गर्बाधार पहुंचता है। फिर खच्चर से रॉख, ग्वालादार, मालपा, प्येलस्पिति, छंकन रे, लामारी, बुदी, गर्ब्यांग, नपल्चू, गुंजी, रौंककौंग, नाभि पहुंचता है। अति दुर्गम और ऊबड़ खाबड़ रास्तों से माल पहुंचने में दो तीन लग जाते हैं। वहीं प्रति किलो पर 35-40 रुपये का अतिरिक्त भाड़ा देना होता है। इस तरह 30 रुपये वाला नमक का एक पैकेट यहां पहुंचते-पहुंचते 70 रुपये का हो जाता है।