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Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   Indian History 03 October This Village 152 People Martyred For Freedom War

इतिहास में तीन अक्टूबर: यहीं लड़ी थी सबसे पहले अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की जंग, 152 लोग हुए थे शहीद

Fri, 04 Oct 2019 08:27 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रुड़की
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रुड़की Published by: अलका त्यागी Updated Fri, 04 Oct 2019 08:27 AM IST
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Indian History 03 October This Village 152 People Martyred For Freedom War
राजा विजय सिंह शहीद स्मारक - फोटो : अमर उजाला

स्वतंत्रता समर के इतिहास के पन्नों पर उत्तराखंड में रुड़की के कुंजा बहादुरपुर गांव का नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा हुआ है। सहारनपुर गजट से लेकर नीदरलैंड की लाइब्रेरी तक तीन अक्टूबर 1824 की क्रांति के लिखे पेज आज भी सुरक्षित है।

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कुंजा गांव को पर्यटन गांव का दर्जा मिला हुआ है। पर्यटन विभाग की ओर सेगांव में राजा विजय सिंह शहीद स्मारक भी बनाया गया है। जिस पर हर वर्ष तीन अक्टूबरर को शहीदों को पुष्प अर्पित कर बलिदान दिवस मनाया जाता है। रुड़की मुख्यालय से लगभग 17 किलोमीटर पश्चिम की ओर कुंजा बहादुरपुर गांव स्थित है। 
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सहारनपुर गजट के मुताबिक सन 1822 में सबसे पहली आजादी की लड़ाई कुंजा बहादुरपुर से ही शुरू हुई थी। अंग्रेजी हुकूमत के जुल्म जब भारतीयों पर ज्यादा बढ़ गए तो स्थानीय लोगों ने इसका जमकर विरोध किया। जिस पर अंग्रेज सेना नाराज हो गई और उन्होंने लोगों को सख्त सजा देनी शुरू कर दी।
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अंग्रेजी शासन से परेशान होकर लोगों के मन में क्रांति के अंकुर फूटने लगे थे। कुंजा बहादुरपुर के लोगों ने अंग्रेजों का मुकाबला करने के लिए करौंदी गांव के पास से अंग्रेजों का असला लूटा और अंग्रेजी सेना को चैलेंज किया। जिसमें बहुत से अंग्रेज सैनिक मारे गए। कुंजा गांव के लोगों से परेशान होकर अंग्रेजी हुकूमत के सरदारों ने 3 अक्टूबर 1824 को गांव को चारों तरफ से घेर लिया। 

जो हाथ लगा उसे बनाया निशाना

लोगों को मुनादी कर बताया कि जो हमसे मिलना चाहता है उसको हम कुछ नहीं कहेंगे। गांव के लोग हथियार डाल दें और जो गांव छोड़कर जाना चाहता हैउसको भी कुछ नहीं कहेंगे, लेकिन राजा विजय सिंह के नेतृत्व में सेनापति कल्याण सिंह व भूरा उपसेनापति ने युद्ध का मोर्चा संभाल लिया और अंग्रेजों को ललकार कर कहा कि हमें समझौता नहीं, हमें आजादी चाहिए।

गांव छोड़कर हम नहीं जाएंगे बल्कि आपको देश छोड़कर जाना ही होगा। जिस पर आगबबूला होकर अंग्रेजी से सैनिकों ने गांव पर चारों तरफ से घेर कर हमला शुरू करदिया और पूरे गांव को शहीद कर डाला। 

जो लोग ज्यादा शक्तिशाली थे, अंग्रेजी सेना ने उनको बांधकर रुड़की के समीप सुनहरा स्थित एक बरगद के पेड़ परफांसी पर लटका दिया था। तभी से 3 अक्टूबर को कुंजा गांव में बलिदान दिवसमनाया जाता है। सरकारी आंकड़ों में भी गांव के 152 लोग शहीद हुए अंकित है। पूर्व ग्राम प्रधान विजय पाल सिंह ने बताया कि लगभग 15 वर्ष पूर्वनीदरलैंड से इतिहास के एक प्रोफेसर जिनका नाम डॉक्टर डीएचए कॉफ था, वह गांवमें आए और तीन-चार दिन तक गांव में ही रुके। उन्होंने गांव का बारीकि से अध्ययन किया। 

उन्होंने बताया कि नीदरलैंड की लाइब्रेरी में एक रिकॉर्ड रखा है। जिसमें कुंजा बहादुरपुर से ही अंग्रेजो के खिलाफ सबसे पहली क्रांति का जिक्र है। उसको पढ़कर ही वह गांव में आए हैं, भ्रमण के बाद जब डॉक्टर नीदरलैंड पहुंचे तो उन्होंने नीदरलैंड की लाइब्रेरी का रिकॉर्ड ग्रामीणों को पोस्ट से भिजवाया। जिसको ग्रामीण आज भी संजोए बैठे हैं। वहीं सहारनपुर गजट में भी कुंजा बहादुरपुर से ही पहली क्रांति शुरू होने का जिक्र है।

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