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पृथ्वी के प्राकृतिक इतिहास में भारत का नाम भी जुड़ा, देवभूमि की बेटी का खास योगदान

Wed, 05 Sep 2018 07:06 AM IST
सुधाकर भट्ट, अमर उजाला, हल्द्वानी
सुधाकर भट्ट, अमर उजाला, हल्द्वानी Updated Wed, 05 Sep 2018 07:06 AM IST
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स्टेगलेमाइट

पृथ्वी के इतिहास के एक खास समय को अब मेघालय स्टेज के नाम से जाना जाएगा। भूवैज्ञानिक समय मान ( जियोलॉजिकल टाइम स्केल ) में 1950 (आधार वर्ष) से 4200 साल पहले के समय को यह नाम दिया गया है। यही समय था जब करीब दो शताब्दियों के सूखे ने सिंधु घाटी के साथ ही ग्रीस, सीरिया, मेसोपोटामिया आदि की सभ्यताओं को पूरी तरह से नष्ट कर दिया था।

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भू वैज्ञानिक समय मान का अध्ययन भू वैज्ञानिक और अन्य वैज्ञानिक पृथ्वी के प्राकृतिक इतिहास के कालक्रम निर्धारण में करते हैं। करीब 11700 साल पहले के समय को वैज्ञानिक हेलोसीन (शीत युग का अंत हुआ और मानव सभ्यता का विकास हुआ) युग की शुरूआत मानते हैं। मेघालय स्टेज इसी हेलोसीन युग में एक कड़ी है।
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इसी युग में 4200 साल पहले का 200 साल का सूखा अभी तक वैज्ञानिकों के लिए किसी पहेली से कम नहीं रहा है। यह वह घटना है जब मौसम में बदलाव और मानव सभ्यता का अस्तित्व एक दूसरे से गुंथ गया। इस सूखे की शुरूआत कैसी रही? 200 साल के अंतराल में इसका विस्तार किस तरह से हुआ? किस तरह से यह सूखा खत्म हुआ? इन सारे सवालों के जवाब पूरी तरह से स्पष्ट नहीं थे।   
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उत्तराखंड की बेटी गायत्री का रहा खासा योगदान

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गायत्री कठायत

इस पहेली को मेघालय में मावमुह गुफा में स्टेलेग्माइट (गुफा में पानी के टपकने से बने चूने के स्तंभ) के अध्ययन से बहुत हद तक सुलझाया गया है। इसके महत्व को देखते हुए ही इंटरनेशनल कमीशन ऑफ स्ट्राटीग्राफी (आईसीएस) ने 1950 को आधार वर्ष मानते हुए 4200 साल पहले के काल खंड को मेघालय स्टेज का नाम देने का प्रस्ताव दिया था। इस प्रस्ताव को इंटरनेशनल यूनियन आफ जियोलाजिकल साइंस ने स्वीकार कर लिया है। इस तरह से देखा जाए तो भू वैज्ञानिक कालक्रम में अब भारत का नाम भी जुड़ गया है। 

नैनीताल में पली बढ़ी और इस समय चीन के झियान जियाटांग विश्वविद्यालय में भारतीय मानसून के शोध की मुख्य शोधार्थी गायत्री कठायत के इसमें योगदान को आइसीएस ने भी स्वीकार किया है। गायत्री ही है जिसने मेघालय की गुफा से यह सैंपल जुटाया ओर अन्य शोधार्थियों की टीम के साथ मिलकर इसका अध्ययन किया। गायत्री के मुताबिक इस सैंपल के विश्लेषण की मदद से अब हम भारतीय मानसून के 4200 साल पहले की स्थिति को और भी बेहतर तरीके से जानते हैं। अब हम और अधिक विश्वास के साथ यह कह सकते हैं कि 4200 साल पहले के सूखे ने सातों महाद्वीपों को प्रभावित किया था। यह सूखा करीब 200 साल रहा और इसकी वजह से कई कृषि आधारित सभ्यताओं को जड़ से उखड़ना पड़ा।

200 साल में भारतीय मानसून में रहा खासा उतार चढ़ाव 
गायत्री के मुताबिक  4200 साल पहले के सूखे के तीन चरण थे। पहले चरण में मानसून कमजोर हुआ और शुष्क मौसम रहा। फिर कुछ समय तक मानसून बेहद सक्रिय हुआ और फिर सूखा पड़ा। 200 साल के सूखे के बजाय यह बीच-बीच में 40 साल तक अधिकतम रहा।

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