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भारत-चीन विवाद: चरवाहों के लिए नहीं खुला बाड़ाहोती बुग्याल क्षेत्र, मलारी से आगे जाने पर रोक

Thu, 02 Jul 2020 07:14 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गोपेश्वर(चमोली)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गोपेश्वर(चमोली) Published by: अलका त्यागी Updated Thu, 02 Jul 2020 07:14 PM IST
सार

  • सीमा पर सेना की चौकसी के चलते बाड़ाहोती बुग्याल नहीं जा पा रहे

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India china Dispute:  Sheep and goat farmers Not get permission to go barahoti bugyal on china border
- फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

गलवां घाटी में भारत-चीन के बीच चल रही तनातनी के चलते इस बार बाड़ाहोती बुग्याल क्षेत्र चरवाहों के लिए नहीं खुल सका है। चरवाहों को इस क्षेत्र तक जाने की इजाजत नहीं मिल सकी है। इस वजह से चरवाहे अपनी भेड़-बकरियों को नीती और मलारी क्षेत्र तक ही ले जा पा रहे हैं।   

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बाड़ाहोती क्षेत्र भेड़ पालकों का सबसे पसंदीदा क्षेत्र माना जाता है। यहां हर साल भेड़-बकरी पालकों की 20 से 25 टोलियां जून से सितंबर माह तक मवेशियों को चराने के लिए पहुंचती हैं। भेड़ पालक यहां टेंट लगाकर रहते हैं। जिला और तहसील प्रशासन की ओर से भेड़ पालकों को सीमा क्षेत्र में जाने की अनुमति दी जाती है। 
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सैनिकों को चेकपोस्ट से हटा सीमा क्षेत्र में भेजा
सीमा क्षेत्र में सेना की चौकसी है। मलारी से लेकर नीती तक जहां-जहां चेकपोस्ट थे, वहां से सैनिकों को हटाकर सीमा क्षेत्र में भेज दिया गया है। सूत्रों ने बताया कि स्थिति सामान्य होने तक जवान सीमा क्षेत्र में ही डटे रहेंगे। 

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हमेशा की तरह अबकी निचले क्षेत्रों में नहीं गए ग्रामीण 

भारत-चीन सीमा पर आईटीबीपी और सेना के जवान मुस्तैद हैं, लेकिन नीती घाटी में निवास करने वाले भोटिया जनजाति के ग्रामीण भी पीछे नहीं। वह भी सैनिकों की हौसला आफजाई के लिए घाटी में ही डटे हुए हैं। नीती, गमशाली और मलारी जैसे गांवों के लोग फिलहाल गांव नहीं छोड़ना चाहते। बता दें कि नीती घाटी के ग्रामीण शीतकाल में छह माह तक जिले के निचले क्षेत्रों में रहते हैं।

दर्जनभर गांव आबाद, ग्रामीण बोले-सेना के साथ
जोशीमठ से करीब 85 किलोमीटर दूर नीती घाटी में करीब दर्जन भर गांव इन दिनों आबाद हैं। घाटी के 76 वर्षीय नारायण सिंह का कहना है कि राजमा, आलू, और चौलाई की बुआई का कार्य पूरा कर दिया गया है।

इसके बावजूद निचले क्षेत्र में वह नहीं जा रहे। गमशाली गांव निवासी 40 वर्षीय चंद्रमोहन फोनिया जोशीमठ में होटल का संचालन करते हैं। वह कहते हैं व्यवसाय और नौकरी देश से बढ़कर नहीं है। बताते हैं कि 1962 के भारत-चीन युद्ध में हमारे परिजन सेना की मदद के लिए घोड़े-खच्चर लेकर सीमा पर गए थे और करीब चार से पांच माह वहीं रहे थे। हम भी सेना के साथ हैं।

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