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1962 के भारत-चीन युद्ध में सेना के लिए मजबूत सूचना तंत्र का काम करते थे नीती घाटी के लोग, पहुंचाते थे सामान 

Mon, 22 Jun 2020 01:30 AM IST
अलका त्यागी प्रदीप भंडारी, अमर उजाला,  जोशीमठ
प्रदीप भंडारी, अमर उजाला,  जोशीमठ Published by: अलका त्यागी Updated Mon, 22 Jun 2020 01:30 AM IST
सार

  • सेना के साथ नो मेंस लैंड बाड़ाहोती तक घोड़ों पर सामान लादकर गए थे।

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India China Dispute Latest News: Niti valley people Helped indian army in 1962 indo china War
- फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

उत्तराखंड में चमोली जिले से लगे चीन सीमा क्षेत्र के अंतिम गांव नीती के ग्रामीणों के लिए देशसेवा सर्वोपरि रही है। ये वही गांव हैं, जहां के ग्रामीण 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान सेना के साथ नो मेंस लैंड बाड़ाहोती तक घोड़ों पर सामान लादकर गए थे।

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यहां के बुजुर्गों को आज भी वह घटनाएं याद हैं। जोशीमठ से करीब 75 किलोमीटर की दूरी पर स्थित नीती गांव में भोटिया जनजाति के ग्रामीण निवास करते हैं। सर्दियों में यह इलाका छह महीने तक बर्फ से ढका रहता है।
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ऐसे में ग्रामीण जिले के निचले क्षेत्रों में निवास करते हैं। इस गांव के ग्रामीण सेना के जवानों को अपने परिवार के सदस्य की तरह मानते हैं। 

पड़ोसी देश की गतिविधियों पर रखते थे पूरी नजर

उनके मुताबिक 1962 में भारत-तिब्बत के बीच व्यापार होता था। ग्रामीण बाड़ाहोती से होकर ही तिब्बत पहुंचते थे। गांव के 70 वर्षीय कुशाल सिंह खाती बताते हैं कि 1962 के युद्ध के समय हम अपने घोड़ों, बकरियों पर सामान लादकर सेना के साथ बाड़ाहोती मैदान तक पहुंच गए थे।

ग्रामीण बुग्यालों में अपनी बकरियों को चराने ले जाते थे तो पड़ोसी देश की गतिविधियों पर भी पूरी नजर रखते थे। गांव के ही 78 वर्षीय रुद्र सिंह राणा बताते हैं कि उस युद्ध के समय ग्रामीणों ने सेना के साथ मिलकर काम किया था। सेना को जरूरत का सामान पहुंचाते थे। 

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