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भारत-नेपाल मिलकर रोकेंगे इंसान और जानवरों की लड़ाई
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Wed, 12 Aug 2015 03:39 PM IST
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भारत-नेपाल के सरहदी क्षेत्रों में बाघ, भालू, गुलदार समेत अन्य जीवों के बढ़ते हमलों के चलते इन क्षेत्रों से हो रहे पलायन को रोकने के लिए कैलास-मानसरोवर क्षेत्र में भारत और नेपाल ने साझा कार्ययोजना शुरू कर दी है।
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इसे पहले भारत में आजमाया जा रहा है फिर नेपाल के चार जिलों में यह कार्ययोजना लागू होगी। कार्ययोजना के लिए मॉडल गांव बांस मैथोली (पिथौरागढ़, उत्तराखंड) को बनाया गया है।
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मानव-वन्य जीव संघर्ष रोकने के लिए कैलास मानसरोवर क्षेत्र में बांस मैथोली गांव में शुरू किया गया पायलट प्रोजेक्ट कामयाब रहा तो नेपाल के दारचूला, बेतड़ी, बजांग और हूमला क्षेत्रों में यह योजना लागू की जाएगी। इसके साथ ही इस मॉडल को उत्तराखंड के पौड़ी, उत्तरकाशी, चमोली आदि जिलों में भी लागू किया जा सकता है।
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यह कार्ययोजना भारतीय वन्य जीव संस्थान, देहरादून की अगुवाई में तैयार की गई है। गत माह अल्मोड़ा में कैलाश पावन भू परिदृश्य संरक्षण एवं विकास परियोजना की बैठक के बाद भारतीय और नेपाल के विज्ञानियों ने दोनों देशों को बांटने वाली काली नदी क्षेत्र की स्थिति देखी।
परियोजना के समन्वयक डॉ. भूपेंद्र सिंह अधिकारी ने बताया कि मानव-वन्य जीव संघर्ष रोकने की इस कार्ययोजना में कैलाश-मानसरोवर परिक्षेत्र की वन पंचायतों, ग्राम पंचायतों तथा इस क्षेत्र में काम कर रहे स्वयं सेवी संगठनों आदि को भी शामिल किया गया है।
मानव-वन्य जीव संघर्ष की स्थिति से उबरने के साथ हिमालयी क्षेत्र की जैव विविधता को भी संरक्षित किया जा सकेगा।
कार्ययोजना के मुख्य बिंदु
- जंगल को संरक्षित करने के साथ यहां आवाजाही कम हो
- किसान फलदार पौधे जंगलों के किनारे नहीं लगाएंगे
- फलदार पौधे गांवों की सीमा के अंदर लगाए जाएंगे
- जलस्रोतों को संरक्षित किया जाए
- वन्य जीवों के रहने के स्थान पर जल की निरंतरता बनी रहे
- प्रतीकात्मक तौर पर देवताओं को जंगल दान करने की परंपरा को प्रोत्साहन
कार्ययोजना की शुरूआत हो गई है। बेसिक यही है कि हम वन्य जीवों के रहने के स्थान पर कोई दखलंदाजी न करें। खाना और पानी उन्हें मिलता रहे तो मनुष्यों की आबादी के तरफ वन्य जीवों की आवाजाही कम हो जाएगी। इससे मानव-वन्य जीव संघर्ष रुकेगा।
- एके दत्ता, प्रमुख वन संरक्षक (वन्य जीव) उत्तराखंड