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उत्तराखंड के दलों की धड़कन बढ़ा रहे निर्दल
अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Wed, 08 Mar 2017 01:54 PM IST
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- फोटो : amar ujala
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मतदान के बाद भाजपा और कांग्रेस भले पूर्ण बहुमत का दावा कर सरकार बनाने की बात कर रहें, लेकिन शीर्ष नेतृत्व ने निर्दलियों के समीकरणों को टटोलना शुरू कर दिया है। वोट प्रतिशत में अधिक इजाफा नहीं होने के साथ बड़ी संख्या में बागियों के निर्दलीय उतरना इसका एक बड़ा कारण है।
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अब तक तीन विधानसभाओं में जिस तरह निर्दलियों और छोटे दलों की बैसाखी के सहारे भाजपा-कांग्रेस की सरकारें चली हैं, उसी से सबक लेकर दोनों बड़े दल मजबूत निर्दलियों को साधने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। आधा दर्जन ऐसी सीटें हैं, जहां निर्दलियों की स्थिति को दोनों दलों के नेता कांटे की मान रहे हैं। जबकि ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार में बसपा की तरफ आ रहे रुझान चिंता बढ़ाने वाले दिख रहे हैं। कांग्रेस इसके संकेत भी दे चुकी है, हालांकि भाजपा नेता खुले तौर पर अन्य दलों और निर्दलियों को खारिज कर रहे हैं।
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प्रदेश में अब तक तीन विधानसभा चुनावों वर्ष 2002, 2007 और 2012 में बसपा, उक्रांद और निर्दलियों की सरकार में अहम भूमिका रही है। हर बार की तरह इस बार भी भाजपा और कांग्रेस नेतृत्व यह दावा कर रहा है कि दोनों पूर्ण बहुमत हासिल कर लेंगे। यह कितना सच साबित होगा यह 11 मार्च को तय हो पाएगा, लेकिन पार्टियां निर्दलियों को नजर अंदाज करने के मूड में नहीं है।
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टिकट कटने से नाराज दो दर्जन से अधिक बागी निर्दलीय मैदान में उतरे थे, जिनमें से आधा दर्जन से अधिक सीटों नरेंद्रनगर से ओमगोपाल, केदारनाथ से आशा नौटियाल और कुलदीप कुमार, सहसपुर में आर्येंद्र शर्मा, गंगोत्री में सूरत राम नौटियाल, पुरोला में दुर्गेश लाल, यमकेश्वर में रेनू बिष्ट, धनौल्टी में प्रीतम पंवार, टिहरी में दिनेश धनै और देवप्रयाग में दिवाकर भट्ट कांटे की टक्कर में हैं।
ये सभी भले निर्दलीय उतरे हैं, लेकिन अधिकांश का किसी न किसी बड़े दल से सियासी रिश्ता रहा है। उन्हीं रिश्तों को कड़ी बनाकर भाजपा और कांग्रेस इनसे संपर्क में रहने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे 11 मार्च को ईवीएम मशीन के रिजल्ट आते ही एक्शन लिया जा सके। पार्टियां निर्दलियों के साथ उक्रांद पर नजर रखे हुए हैं। इस बार उक्रांद एकजुट होकर चुनाव लड़ रही है। डीडीहाट से काशी सिंह ऐरी और द्वाराहाट से पुष्पेश त्रिपाठी भी मुकाबले में बने हुए हैं। उक्रांद का इससे पहले भाजपा और कांग्रेस दोनों के साथ गठबंधन रह चुका है।
हाथी की चाल को भांप रहे बड़े दल
मैदानी सीटों पर मतदान का अधिक प्रतिशत भाजपा और कांग्रेस भले अपने खाते में मान रहे हैं, लेकिन वहां दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को लेकर चलने वाली बसपा बड़ा उलटफेर कर सकती है। हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर की 20 मैदानी सीटों में बसपा टाप थ्री पर तो रहेगी जबकि तीन से चार सीटों पर नंबर वन की पोजिशन भी पा सकती है। ऐसे में अगर दोनों दल पूर्ण बहुमत से कुछ दूर रहते हैं तो बसपा एक बार फिर किंगमेकर की भूमिका में होगी।
वर्ष 2012 में बसपा का दोनों मैदानी जनपदों में 25 प्रतिशत से अधिक वोट शेयर रहा है। हरिद्वार में तो तीन सीटें भगवानपुर, झबरेड़ा और मंगलौर में पार्टी जीती, जबकि ज्वालापुर, पिरान कलियर, खानपुर और लक्सर में नंबर दो और चार सीटों पर पार्टी तीसरे स्थान पर खिसकी। ऊधमसिंह नगर में बसपा पुराना रिकॉर्ड तो नहीं दोहरा पाई, लेकिन नौ सीटों से सात पर टॉप थ्री में रही। इस बार बसपा प्रत्याशी हरिद्वार में तीन सीटों मंगलौर, खानपुर, लक्सर और ऊधमसिंह नगर में खटीमा सीट पर मजबूत बताए जा रहे हैं। इसका कारण इन सीटों के जातीय समीकरणों को माना जा रहा है।
मतदान प्रतिशत
वर्ष भाजपा कांग्रेस बसपा उक्रांद निर्दलीय
2012 33.38 34.03 12.28 1.93 12.34
2007 31.90 29.59 11.76 5.49 11.21
2002 25.81 26.91 11.20 6.36 16.30