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लोकायुक्त विधेयकः नए 'कानून' को मंजूरी
अमर उजाला, देहरादून
Updated Thu, 17 Oct 2013 10:53 AM IST
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भ्रष्टाचार पर लगाम कसने वाले लोकायुक्त विधेयक को राष्ट्रपति ने उत्तराखंड में मंजूरी दे दी है। यह विधेयक भाजपा की बीसी खंडूरी सरकार के दौरान पारित हुआ था। एक-दो दिन में इसका नोटीफिकेशन जारी कर दिया जाएगा। नोटीफिकेशन के साथ ही यह प्रदेश में कानून के तौर पर लागू हो जाएगा।
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प्रदेश के चीफ मिनिस्टर तक दायरे में
राष्ट्रपति को भेजा गया विधेयक का ड्राफ्ट अगर किसी संशोधन के बगैर मंजूर हुआ है तो अब राज्य के सरकारी दफ्तरों में कार्यरत प्यून (चतुर्थ श्रेणी कार्मिक) से लेकर प्रदेश के चीफ मिनिस्टर तक लोकायुक्त के दायरे में होंगे।
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यहां तक कि अधीनस्थ न्यायपालिका भी। हाईकोर्ट के जजों को इससे मुक्त रखा गया है। भाजपा सरकार में भुवनचंद्र खंडूरी ने दूसरी बार नेतृत्व संभालने के बाद अक्तूबर 2011 में मजबूत लोकायुक्त की घोषणा की थी।
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करनी पड़ी मशक्कत
उसके बाद पखवाड़ेभर की मशक्कत में लोकायुक्त का ड्राफ्ट तैयार कर कैबिनेट में मंजूर कराया गया और फिर विधानसभा से पास करवा कर राज्यपाल को भेजा गया। तत्कालीन राज्यपाल मार्ग्रेट आल्वा ने भी ड्राफ्ट पर अपनी स्वीकृति देते हुए विधायी विभाग को भेज दिया था।
बाद में विधायी विभाग ने नवंबर 2011 में विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेज दिया था। विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने में करीब दो साल लग गए।
यह होगी लोकायुक्त चयन प्रक्रिया
लोकायुक्त का चयन एक चयन समिति करेगी। समिति में सात सदस्य होंगे। चयन समिति द्वारा एक सर्च कमेटी बनाई जाएगी, जो आवेदन एकत्रित कर प्रत्येक पद के लिए तीन-तीन नामों का पैनल चयन समिति को मुहैया कराएगी।
चयन समिति फिर लोकायुक्त की नियुक्ति करेगी। लोकायुक्त का कार्यकाल अधिकतम पांच साल अथवा 70 वर्ष की आयु (जो भी पहले पूरा हो) का होगा।
ये होंगे लोकायुक्त के दायरे में
मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद के सदस्य, विधायक, उत्तराखंड के सभी राजकीय सेवक (सभी अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारी सहित), पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व मंत्री, सेवानिवृत्त अधिकारी, स्थानीय निकाय के निर्वाचित सदस्य एवं कर्मचारी, सहकारी समितियों के निर्वाचित सदस्य एवं कर्मचार, सार्वजनिक उपक्रम, निगम, विकास प्राधिकरण, परिषद, सरकारी कंपनी, आयोग, राज्य के विश्वविद्यालय और राज्य सरकार से वित्तीय सहायता प्राप्त करने वाली संस्थाएं।
हटाना नहीं होगा आसान
लोकायुक्त का चयन जितना मुश्किल भरा है, उससे कहीं ज्यादा कठिन उसे हटाना है। विधेयक के मुताबिक लोकायुक्त के अध्यक्ष अथवा सदस्य को उसके पद से राज्यपाल द्वारा सुप्रीमकोर्ट की संस्तुति पर ही हटाया जा सकेगा।
यह तभी संभव होगा, जब संबंधित के विरुद्ध दुर्व्यवहार अथवा कदाचार में दोषी पाया जाएगा। अथवा मानसिक और शारीरिक अस्वस्थता के कारण अपना कार्य करने में असमर्थ हो गया हो। दीवालिया घोषित हो गया हो या फिर अपने कार्यकाल अवधि में दूसरे किसी रोजगार में संलग्न हो गया हो।
यहां से भेजे गए लोकायुक्त विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई है। विधेयक देखने के बाद राष्ट्रपति की संस्तुति के मुताबिक एक-दो दिन में नोटीफिकेशन कर दिया जाएगा।
- केडी भट्ट, प्रमुख सचिव विधायी एवं संसदीय कार्य
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