बंदिशों की बेड़ियां तोड़कर अंजू ने भरी उड़ान, हुनर में साक्षर महिलाओं से भी आगे
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बदलते भारत के ग्रामीण इलाकों में महिलाओं को आज भी उनका वाजिब हक नहीं मिल पा रहा है। शिक्षा की पगडंड़ी छोड़कर घर की दहलीज में ही मानसिक बेड़ियों से महिलाओं को जकड़ा जाता है, लेकिन अंजू प्रजापति इन सभी बेड़ियों को तोड़कर, समाज के लिए मिसाल बन गई हैं। लोगों के घरों में काम से लेकर जच्चा-बच्चा की मसाज में महारत हासिल करने का सफर तय कर अंजू ने सफलता हासिल की। आज निरक्षर होने के बावजूद जीवन की दौड़ में अंजू साक्षर महिलाओं से कहीं आगे निकल गई हैं।
हरिद्वार जिले में पथरी के बंगला गांव निवासी अंजू प्रजापति तीन भाइयों में अकेली बहन थी। बेटी होने के कारण माता-पिता ने कभी स्कूल नहीं भेजा और 16 वर्ष की उम्र में ही हेत्तमुपर आन्नेकी निवासी पाल सिंह से शादी करा दी। शादी के बाद भी उसकी हालत में कोई सुधार नहीं आया। पति शराब का आदि निकला तो ससुराल का व्यवहार भी उसके प्रति ठीक नहीं रहा।
वीएलसीसी कंपनी की नजर अंजू पर पड़ी
20 वर्ष की आयु में अंजू मां बनी और समय के साथ उसने तीन बेटियाें और एक बेटे को जन्म दिया। घर की माली हालत सुधारने के लिए अंजू ने जंगल से भाभड़ घास काटकर बेचना शुरू किया। फिर लोगों के घरों में काम करना शुरू किया तो आय कुछ ज्यादा होने लगी। इसी बीच अंजू ने जच्चा-बच्चा की मसाज भी शुरू कर दी।
मसाज में अंजू के हाथ का जादू चला तो लोगों में चर्चा होने लगी। इसी बीच वीएलसीसी कंपनी की नजर अंजू पर पड़ी। कंपनी ने खुद के खर्च पर अंजू को मसाज और पार्लर आदि के प्रशिक्षण के लिए दिल्ली भेजना चाहा, पर घर वालों ने मना कर दिया।
समाज की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा
मगर अंजू परिवार के विरोध के बावजूद दिल्ली चली गई। करीब एक महीने का कोर्स करने के बाद तो मानों अंजू की किस्मत चमक गई। अच्छी आमदनी हुई तो अंजू ने सबसे पहले खुद के पैसों से घर बनाया और बच्चों को अच्छी शिक्षा दी। अंजू दोपहर तक लोगों के घरों में जाकर मसाज करती हैं फिर कंपनी में जाकर काम करती हैं।
अब वह देहरादून व आसपास के शहरों में जाकर जच्चा-बच्चा की मसाज करती हैं। अन्य जनपदों के प्रशासनिक अधिकारी, जज आदि अंजू के क्लाइंट हैं। अंजू अब करीब 15 हजार मासिक कमा रही हैं। अंजू का हौसला बढ़ाने में जुटी साहित्यकार डॉ. राधिका नागरथ का कहना है कि अंजू जिन विपरीत हालातों से लड़कर आगे बढ़ रही है वह समाज की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा है।
पति ने भी पकड़ी सही राह
अंजू कुम्हार परिवार से हैं। पति मिट्टी के घड़े बनाने का कार्य करता था। मगर शराब की लत में पड़कर पति ने कामकाज बंद कर दिया था। ऐसे में अंजू खुद बुग्गी लेकर मिट्टी लाती थी। फिर धीरे-धीरे मिट्टी से बर्तन बनाने भी सीख लिए। अब पति ने भी शराब छोड़ दी है। साथ ही खाली समय में अंजू के साथ बर्तन बनाने में उनकी मदद करता है।
शराब के खिलाफ मुखर की थी आवाज
अंजू बताती हैं कि एक बार गांव में शराब समस्या बन गई थी, तो उन्होंने सभी महिलाओं को साथ लेकर शराब के खिलाफ आवाज मुखर की। महिलाओं के साथ जिलाधिकारी से मिली और कुछ समय बाद शराब के ठेके को बंद कराया। ग्रामीणों ने प्रधानी का चुनाव लड़ने की अपील भी, लेकिन वह चुनाव नहीं लड़ीं।
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