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आईएफएस अफसरों को नहीं रास आ रहे 80 साल पुराने नियम

Fri, 28 Aug 2015 04:14 PM IST
रजा शास्त्री/अमर उजाला, देहरादून
रजा शास्त्री/अमर उजाला, देहरादून Updated Fri, 28 Aug 2015 04:14 PM IST
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IFS wants change in forest rights act.

भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारी चाहते हैं कि अब फॉरेस्ट राइट्स एक्ट (एफआरए) और वन नीति बदली जाए। सीनियर आईएफ एस अफसर इसे वक्त की जरूरत मानते हैं। उनका कहना है कि प्राकृतिक आपदाएं, जलवायु परिवर्तन और वनों के बढ़ते दोहन के बदलते वैश्विक माहौल में वन नीतियां सम-सामयिक स्थिति के लिहाज से तैयार हों।

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ताजा स्थिति के मुताबिक वन विभाग भी अपने अधिकारियों को अपडेट कर रहा है। अफसरों को अब एशिया की स्थिति बताने से ज्यादा अमेरिकी और यूरोपीय महाद्वीप की ताजा स्थिति से परिचित कराने पर जोर है।
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वन अनुसंधान संस्थान स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी में इस वक्त देश भर के भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारियों का मिड कैरियर ट्रेनिंग प्रोग्राम (एमसीटी) फेज-4 चल रहा है। इसमें 16 से 18 वर्ष सेवा कार्य वाले 59 आईएफएस अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

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बदली स्थितियों में नियमों में बदलाव की जरूरत

IFS wants change in forest rights act.

इन अफसरों को वैश्विक स्तर पर बदलाव की चुनौतियों के मुकाबले के लिए तैयार करने के साथ उनके वर्षों के फील्ड सेवा कार्य के अनुभवों को संकलित किया जा रहा है, ताकि नई रणनीति बन सके।

पैनल डिस्कशन में भारतीय वन सेवा के अधिकारियों ने एकमत होकर नया फॉरेस्ट राइट्स एक्ट बनाने की हिमायत की। उनका कहना था कि एफआरए ब्रिटिश काल में बना था, इसे बने 80 साल से अधिक समय हो गया। स्थिति बदल गई है जिससे वन नीतियों में तब्दीली की जरूरत है।

जंगलों में दखलंदाजी बढ़ी है, 80 साल पहले की जंगली जनजातियों के जीवन शैली में बदलाव आया है। अधिकारियों का कहना था कि जब एक्ट बना था तो वन आधारित उद्योग इतने नहीं थे। अब फार्मास्युटिकल्स उद्योग वनों पर निर्भर हो गया है।

वनस्पतियों के दोहन पर प्रभावी अंकुश की पुरानी नियमावली में व्यवस्था नहीं है। अफसरों ने फॉरेस्ट सर्टिफिकेशन सरीखी व्यवस्था लागू करने पर जोर दिया।

जहां जरूरत नहीं वहां खत्म हो छूट

IFS wants change in forest rights act.

यह व्यवस्था लागू होने से बिना सत्यापन के जंगल से लकड़ी बाहर नहीं आ पाएगी। वनों को सुरक्षित रखने और दोहन रोकने के लिए प्रभावी नियम बनें। कभी जंगलों पर निर्भर रहीं जनजातियां समाज की मेन स्ट्रीम में आ रही हैं लेकिन नियमावली में छूट पुरानी है।

जहां जरूरत नहीं वहां छूट खत्म हो। नए सिरे से वनों की स्थिति के लिहाज से कानून बने। वन सेवा अधिकारियों को अमेरिकी महाद्वीप की वन एवं पर्यावरण की स्थिति जानने के लिए अक्तूबर में येल विश्वविद्यालय अमेरिका और यूरोपीय स्थिति की जानकारी के लिए फिनलैंड भेजा जाएगा।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी के अपर निदेशक डा.आलोक सक्सेना ने बताया कि इन अधिकारियों की दो टीमें बनाई गई हैं।

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