आपदा के लिए जिम्मेदार नहीं ये परियोजना
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दीर्घकालिक विकास के लिए जल विद्युत ऊर्जा पर तीन दिन कि अंतर्राष्ट्रीय कार्यशाला में पहले दिन ही यह उभर कर आया कि केदारनाथ की 2013 की आपदा का जल विद्युत परियोजनाओं से कोई संबंध नहीं है।
हाल यह था कि आपदा के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री को तक उनके सलाहकारों को सभी संबंधित पहलुओं के आंकड़ों से समझाना पड़ा। अब निजी निवेशक बड़ा निवेश करने को तैयार हैं पर पर्यावरण और अन्य कानूनी समस्याएं दूर नहीं हो पाई हैं। पहले दिन नीति और वित्तीय विकल्प के तकनीकि सत्र में विषय विशेषज्ञों ने साफ कहा कि दीर्घकालिकता (ससटेनेबिलिटी) से कोई समझौता संभव नही हैं।
कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में उत्तराखंड के मुख्य सचिव एन रविशंकर ने कानूनों की आड़ में हम अपने लिए खुद ही खलनायक बन गए है। जल विद्युत ऊर्जा सबसे मुफीद ऊर्जा है पर इसी का विकास नहीं हो पा रहा है। नवीन एवं नवीनीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के लघु जल विद्युत परियोजना के सलाहकार पीकेसक्सेना ने कहा कि बीते 20 साल जल विद्युत ऊर्जा के लिए सबसे बेकार समय साबित हुआ।
केदारनाथ की आपदा ने इस नकारात्मक ट्रेंड को और बढ़ावा दिया। अब नेशनल मिशन के तहत तीन साल में 5000 मेगावाट का लक्ष्य रखा गया है। केंद्र सरकार इसके लिए उत्तराखंड और हिमाचल की ओर देख रही है।
बहस वैज्ञानिक सोच और तथ्यों पर आधारित
केंद्रीय विद्युत आयोग के पीके शुक्ला ने बताया कि करीब 26 हजार मेगावाट की जल विद्युत परियोजनाएं सिर्फ पर्यावारणीय स्वीकृति न मिलने केकारण अटकी हुई हैं। 20 हजार मेगावाट की परियोजनाओं पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के स्तर से कोई निर्णय न होने के कारण काम नहीं हो पा रहा है।
ऊर्जा सचिव उमाकांत पंवार ने कहा कि केदारनाथ की आपदा के बाद प्रदेश में जल विद्युत ऊर्जा को लेकर बहस खड़ी हो गई है। इस कार्यशाला से परियोजनाओं को लेकर खड़े किए जा रहे विवादों का निपटारा हो सकेगा। मुख्यमंत्री हरीश रावत के सलाहकार इंदु कुमार पांडे के मुताबिक परियोजनाओं को लेकर बेतुके तर्क कई बार दिए गए। कहा गया कि नदी की पवित्रता इससे प्रभावित होगी। बहस वैज्ञानिक सोच और तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए।
इंटरनेशनल हाइड्रो पावर एसोसिएशन के साइमन हावर्ड ने कहा कि दीर्घकालिकता से कोई समझौता अब संभव नही है। चीन इस समय 29 हजार मेगावाट की उत्पादकता से विश्व में सबसे आगे है।
तीन दिन की इस कार्यशाला में जल विद्युत परियोजनाओं और दीर्घकालिक विकास से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर करीब 55 शोध पत्र रखे जाएंगे। इसमें भारत के अलावा स्वीडन, नार्वे, कनाडा, नेपाल, ब्रिटेन आदि के विशेषज्ञ शामिल हो रहे हैं। कार्यशाला का आयोजन राज्य सरकार और आईआईटी रुड़की की वैकल्पिक ऊर्जा विभाग की ओर से है।