शिकारी को पसंद नहीं नरभक्षी का शिकार, आखिर क्यों?
अपनी जान जोखिम में डालकर लोगों को आदमखोर के भय निजात दिलाने वाले शिकारियों को वन विभाग बंदूक की गोली तक का खर्चा नहीं देता है। आज जिम कार्बेट माने जाने वाले ये शिकारी अपने खर्च से काम करते हैं।
वन विभाग गुलदार को आदमखोर घोषित कर शिकारी को क्षेत्र में तो भेजते हैं, लेकिन आने जाने का खर्चा तक नहीं दिया जाता है।
यहां तक कि शिकारी को गुलदार को मारने के लिए बंदूक की गोली तक खुद खरीदनी पड़ती है। ऐसे में इस कार्य के लिए आधुनिक तकनीकी की बंदूक की सुविधा मुहैया कराना दूर की बात है।
चर्चित शिकारी पौड़ी के लोअर चोपड़ा निवासी जॉय हुकिल कहते हैं कि आधुनिक सुविधा मुहैया हो जाए तो यह कार्य काफी आसान हो जाएगा।
लोगों का दर्द देखकर उठाते हैं बंदूक
उनका कहना है कि संबंधित क्षेत्र के लोग उनके गांव में रहने और खाने की व्यवस्था करा देते हैं। विभाग की ओर अन्य कोई सुविधा नहीं दी जाती है।
शिकारी जॉय हुकिल बताते हैं कि इस कार्य के लिए वे अपनी विदेशी राइफल का उपयोग करते हैं। जिसकी गोली विदेश से आती है।
उनका कहना है कि उन्हें इस जानवर को मारने का मन नहीं करता लेकिन खूंखार होने पर लोगों का दर्द नहीं देखा जाता। इसलिए इसका शिकार करने को मजबूर होना पड़ता है।
आदमखोर घोषित गुलदार को मारने के लिए तैनात किए जाने वाले शिकारियों को वन विभाग द्वारा कोई खर्चा नहीं दिया जाता है। गुलदार को मारने के लिए उक्त शिकारी स्वयं सेवक की तरह कार्य कर समाज सेवा का कार्य क रते हैं।
-राजमणि पांडे प्रभागीय वनाधिकारी गढ़वाल वन प्रभाग पौड़ी