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गढ़वाली, कुमाऊंनी बोली को मिले सम्मान
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
Updated Mon, 22 Feb 2016 12:12 PM IST
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गढ़ राजाओं और चंद शासनकाल में राजभाषा रही गढ़वाली, कुमाऊंनी बोली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के नाम पर प्रदेश सरकार कई बार केंद्र को पत्र भेज चुकी है। पर्याप्त साहित्यिक पृष्ठभूमि के बावजूद इसे अनुसूची में शामिल नहीं किया जा सका है।
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मैथिली, बोडो और कोकणी से कहीं अधिक लोग गढ़वाली, कुमाऊंनी बोलते हैं। 1560-1790 ईसवी तक सभी शासकीय कार्य गढ़वाली एवं कुमाऊंनी बोली में होते थे। ताम्रपत्रों, शिलालेखों एवं सरकारी दस्तावेजों में इसके अभिलेखीय प्रमाण मौजूद हैं। वर्ष 1905 में गढ़वाल यूनियन नामक संस्थान से तारादत्त गैरोला व विश्वंभर दत्त चंदोला ने गढ़वाली पत्रिका का संपादन शुरू किया।
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देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में गढ़वाली, कुमाऊंनी बोली एवं साहित्य पर कई पीएचडी शोध ग्रंथ लिखे जा चुके हैं। सन 1913 में गढ़वाली भाषा का प्रथम समाचार पत्र गढ़वाली समाचार प्रकाशित हुआ। इसके अलावा भी इसकी कई साहित्यिक पृष्ठभूमि हैं, इसके बावजूद गढ़वाली, कुमाऊंनी बोली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया जा सका है।
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ऐसे खेल रहे चिट्ठी-चिट्ठी
राज्य सरकार की ओर से गढ़वाली-कुमाऊंनी बोली को आठवीं अनुसूची में शामिल करने एवं शासकीय मान्यता दिए जाने के लिए केंद्र सरकार को कई पत्र लिखे जा चुके हैं।
19 दिसंबर 2014 और इससे पहले 29 नवंबर 2014 को दो बार तत्कालीन सचिव सीएस नपलच्याल गृह सचिव को पत्र लिख चुके हैं। इससे पहले तत्कालीन अपर सचिव विनोद शर्मा की ओर से केंद्र को पत्र लिखा गया। वहीं युवा गढ़वाल सभा की मांग पर अब राष्ट्रपति कार्यालय से भी राज्य सरकार को कार्रवाई के लिए लिखा गया है।
राज्य गठन के 15 साल बाद भी यहां की बोली को राजभाषा का दर्जा नहीं मिल पाया है। मामले में केवल चिट्ठी-चिट्ठी का खेल चल रहा है। जनभावनाओं को देखते हुए इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए।
- सुयश कुकरेती, सचिव युवा गढ़वाल सभा
तीन सौ से अधिक पोस्ट कार्ड भेजे
युवा गढ़वाल सभा की ओर से विश्व मातृ भाषा दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में गढ़वाली, कुमाऊंनी को संवैधानिक दर्जे की मांग को लेकर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति सहित कई सांसदों को तीन सौ से अधिक पोस्ट कार्ड भेजे गए। कार्यक्रम में सभा के अध्यक्ष शांति प्रसाद भट्ट, हरि शंकर नेगी, ऊषा भट्ट, नीलम ढौंढियाल, मोना काला, पंकज मौजूद रहे।
बच्चों की बोली भाषा को स्कूल में मिलेगा सम्मान
देहरादून के सरकारी स्कूलों में आगामी शिक्षण सत्र अप्रैल 2016 से बच्चे अपनी बोली भाषा पढ़ सकेंगे। 26 फरवरी से इसके लिए एससीईआरटी में पांच दिवसीय कार्यशाला शुरू होने जा रही है। इसमें प्रदेश भर से विशेषज्ञ जुटेंगे। जो इसके ड्राफ्ट को अंतिम रूप देंगे।
एससीईआरटी की अपर निदेशक गीता नौटियाल के मुताबिक इसी शिक्षण सत्र से पाठ्यक्रम में न सिर्फ गढ़वाली, कुमाऊंनी, रं और जौनसारी को शामिल किया जा रहा है बल्कि राज्य के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों, पहाड़ की संस्कृति, भौगोलिक स्थिति को भी बच्चे स्कूल में पढ़ सकेंगे।
अपर निदेशक ने कहा कि चमोली गौचर में गढ़वाली, अल्मोड़ा में कुमाऊंनी और देहरादून में रं भाषा को लेकर आयोजित कार्यशालाओं में विशेषज्ञों की ओर से अलग-अलग ड्राफ्ट तैयार किए गए हैं। उन्होंने कहा कि प्राथमिक से माध्यमिक तक के पाठ्यक्रम में इसे शामिल किया जाएगा।