हिंदी हैं हम: उत्तराखंडी साहित्यकारों ने हिंदी की जगाई अलख, पहचान बनाई अलग, पढ़ें खास रिपोर्ट...

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Tue, 31 Aug 2021 11:38 PM IST

सार

पीतांबर दत्त बड़थ्वाल, शिवानी, मनोहर श्याम जोशी, हिमांशु जोशी, मंगलेश डबराल, लीलाधर जगूड़ी जैसे अनेक उत्तराखंडी साहित्यकारों ने हिंदी को समृद्ध बनाने में अहम योगदान दिया है। 
हिंदी(प्रतीकात्मक तस्वीर)
हिंदी(प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock
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विस्तार

उत्तराखंड में बेशक गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी बोलियां वैचारिक संप्रेषण के लिए बोली जाती हों, परंतु यह प्रदेश हिंदी पट्टी का ही हिस्सा है। उत्तराखंड के अनगिनत साहित्यकारों ने न सिर्फ हिंदी की अलख जगाई है बल्कि अपने विशिष्ट साहित्यिक अवदान की वजह से राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अलग पहचान भी बनाई है। छायावाद के शीर्षस्थ चार कवियों में एक प्रमुख हस्ताक्षर सुमित्रा नंदन पंत हैं। पीतांबर दत्त बड़थ्वाल, शिवानी, मनोहर श्याम जोशी, हिमांशु जोशी, मंगलेश डबराल, लीलाधर जगूड़ी जैसे अनेक उत्तराखंडी साहित्यकारों ने हिंदी को समृद्ध बनाने में अहम योगदान दिया है।  
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देहरादून: कई साहित्यकारों ने बनाई अलग पहचान
डा. नंदकिशोर हटवाल, डा. अतुल शर्मा, मुकेश नौटियाल, अंबर खरबंदा, इंद्रजीत सिंह समेत तमाम बड़े साहित्यकार देहरादून से संबद्ध रहे हैं। युवा दौर के कई लेखक भी हैं, जो हिंदी साहित्य लेखन के जरिये भाषा की सेवा कर रहे हैं। उनकी इस उपलब्धियों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सराहा भी गया है। इसके लिए उन्हें कई सम्मान और पुरस्कार भी प्रदान किए गए हैं। जिले में कुछ स्वयं सेवी संस्थाएं भी हैं, जो हिंदी को बढ़ावा देने का काम कर रही हैं। दून के ज्यादातर प्राइवेट स्कूलों ने भी हिन्दी की ताकत को पहचाना है। किसी दौर में दून के प्राइवेट अंग्रेजी स्कूलों में हिंदी बोलना अच्छा नहीं माना जाता था। लेकिन अब वहां भी हिंदी को वही सम्मान और गौरव हासिल है, जो अंग्रेजी को मिलता है।


हरिद्वार: स्वामी श्रद्धानंद हर जगह देखना चाहते थे हिंदी को
धर्मनगरी में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में संस्थापक स्वामी श्रद्धानंद हिंदी को हर जगह देखना चाहते थे। इसको जन-जन की भाषा बनाने के लिए आज भी अलख जगाई जा रही है। विश्वविद्यालय में आज भी समस्त प्रशासनिक और पत्राचार हिंदी में ही किया जाता है। यहां पढ़ने वाले हर बच्चों केे वैदिक से संस्कृत के साथ ही हिंदी का भी ज्ञान दिया जाता है। विश्वविद्यालय की ओर से हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी हिंदी लागू करने के लिए लड़ाई लड़ी जा रही है। इस संबंध में अब  राष्ट्रपति को भी ज्ञापन भेजे जाएंगे। 1902 ब्रिटिशकाल में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय की स्थापना स्वामी श्रद्धानंद ने की थी। विश्वविद्यालय के सहायक कुल सचिव पंकज कौशिक ने बताया कि स्वामी जी मैकाले शिक्षा पद्धति के घोर विरोधी थे। उनका कहना था कि अंग्रेजी उधार की भाषा है। वह हिंदी के एक बहुत बड़े विद्वान थे। स्वामी श्रद्धानंद देश में हर जगह हिंदी देखना चाहते थे। इसलिए वह अपने भाषणों में भी हिंदी भाषा और लोगों से भी हिंदी के प्रयोग पर जोर देते थे, ताकि मातृ भाषा हिंदी के बल पर देश को आजादी दिलाई जा सके।

रुद्रप्रयाग : हिंदी को नया आयाम देने में जुटी नई-पुरानी पीढ़ी
जिले में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए नई व पुरानी पीढ़ी के कई लोग जुटे हुए हैं। इनकी कई पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। बेंजी गांव के रमाकांत बेंजवाल ने श्रीनंदा राजजात और उसके महत्व पर 2012 में पुस्तक प्रकाशित की थी। 70 वर्षीय जीवंती देवी भी कई विषयों पर पुस्तकों की रचना कर चुकी हैं। शिक्षक व साहित्यकार नंदन सिंह राणा ने हिंदी कविताओं को नया रूप देने का काम किया है। कुछ दिन पहले ही उनकी पुस्तक का लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी ने विमोचन किया है। इसके अलावा युवा लेखक दीपक बेंजवाल महर्षि अगस्त्य के बारे में पुस्तक लिख चुके हैं। वहीं वयोवृद्ध पद्म सिंह गुंसाई ने हिंदी लेखन को नया आयाम देने का काम किया। उनके चमोली व रुद्रप्रयाग जिले समेत पहाड़ व उत्तराखंड के विषय में हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में कई लेख प्रकाशित हो चुके हैं। साथ ही हिंदी को बढ़ावा देने के लिए हिंदी साहित्य भारती (अंतरराष्ट्रीय) की ओर से कार्यकारिणी का गठन किया गया है। हिंदी साहित्य भारती ने हिंदी को राष्ट्र भाषा घोषित करने के लिए हस्ताक्षर अभियान भी शुरू किया है। साथ ही कोरोनाकाल में ऑनलाइन कार्यक्रम भी आयोजित किए जा रहे हैं।

पौड़ी जिले में रही हिंदी साहित्य की समृद्धशाली परंपरा

वर्ष 1902 में लैंसडौन से पंडित गिरिजादत्त नैथानी ने प्रेस की स्थापना की और गढ़वाल का पहला समाचार पत्र गढ़वाल समाचार पत्र निकाला। उनके बाद हिंदी के प्रथम डी. लिट डा. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल, पूर्व केंद्रीय मंत्री डा. भक्त दर्शन ने हिंदी साहित्य में खूब नाम कमाया। भजन सिंह, डा. शिव प्रसाद डबराल, भैरवदत्त धूलिया, आदित्यराम दुतपुड़ी, ललिता प्रसाद नैथानी और पीतांबर दत्त देवरानी ने हिंदी की धारा को प्रवाहित करने में अहम भूमिका निभाई। वर्तमान समय में डा. नंदकिशोर ढौंडियाल अरुण, वेद प्रकाश माहेश्वरी, नागेंद्र ध्यानी, गणेश खुगशाल गणि, डा. जगदंबा कोटनाला, ललन कुमार बुड़ाकोटी समेत कई कवि और साहित्यकार हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में कार्य कर रहे हैं। कोटद्वार की साहित्यिक संस्था साहित्यांचल पिछले कई सालों से हिंदी साहित्य पर केंद्रित वार्षिक पत्रिका का प्रकाशन कर रही हैं।

नई टिहरी ने दिए मंगलेश डबराल और वीरेंद्र डंगवाल जैसे साहित्यकार
टिहरी के  मंगलेश डबराल और डा. वीरेन डंगवाल साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हिंदी लेखक रहे हैं। दोनों राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य संपादक रहे। मंगलेश डबराल काफल पानी गांव में जन्मे। उनकी पहाड़ पर लालटेन, हम जो देखते हैं, लेखक की रोटी, एक बार आयोवा, आवाज भी एक जगह है जैसी प्रसिद्ध कविताएं हैं। डा. वीरेन डंगवाल का जन्म कीर्तिनगर में हुआ। इसी दुनिया में, दुष्चक्र में स्रष्टा, कवि ने कहा, स्याही ताल उनकी प्रमुख रचनाएं रही हैं। विद्यासागर नौटियाल का जन्म मालीदेवल गांव में हुआ। उलझे रिश्ते, सूरज सबका है, टिहरी की कहानियां, भीम अकेला, भैंस का कट्या, सोना, उत्तर बांया है, मोहन गाता जाएगा, टिहरी के बागी. गाए जा जैसी कई कहानियां हैं, जिन पर टेलीविजन सीरियल भी बने। मौजूदा समय में साहित्यकार सोमवारी लाल उनियाल, गजेंद्र नौटियाल, और सत्यानंद बडोनी भी हिंदी को मजबूत बनाने के लिए काम कर रहे हैं।

उत्तरकाशी : लीलाधार जगूड़ी व महावीर रवांल्टा छाए 
जनपद के साहित्यकारों में पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी व महावीर रवांल्टा प्रमुख हैं। जगूड़ी ने उत्तराखंड के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की पहली पत्रिका उत्तरांचल दर्शन का संपादन भी किया। शंखमुखी शिखरों पर (कविता संग्रह) नाटक जारी है। इस यात्रा में, रात अब भी मौजूद है, बची हुई पृथ्वी, घबराए हुए शब्द, अनुुभव के आकाश में चांद, महाकाव्य के बिना, खबर का मुंह विज्ञापन से ढंका है, पांच बेटे (नाटक), भय भी शक्ति देता है जैसी रचनाएं खासी चर्चित रही हैं। महावीर रवांल्टा का जन्म यमुना घाटी के सरनौल गांव में हुआ था। महावीर रवांल्टा चार दशकों से साहित्य के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। उनकी 38 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इन्हें विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित भी किया गया है। उत्तरकाशी में साहित्य के क्षेत्र में अजीम प्रेमजी फाउंडेशन कार्य कर रहा है।

चमोली: हिंदी साहित्य सृजन में बीता शिवराज सिंह नि:संग का जीवन
चमोली जिले में हिंदी साहित्य को बढ़ावा देने के लिए कई लोगों ने अद्वितीय कार्य किया है। इनमें सबसे प्रमुख और चर्चित रहे घिंघराण क्षेत्र के देवर खडोरा गांव के शिवराज सिंह नि:संग हैं। साहित्यकार स्वर्गीय शिवराज सिंह ने अपना संपूर्ण जीवन हिंदी साहित्य के लिए समर्पित किया था। उन्होंने करीब 20 किताबों का लेखन किया, जिसमें से कालीमठ काली तीर्थ, उत्तराखंड में चंडिका जात, पेशावर गोलीकांड का लौह पुरुष, बदरीनाथ धाम दर्पण, केदार हिमालय और पंच केदार आदि प्रमुख किताबें रहीं। सकंड गांव के स्वर्गीय चंद्र बल्लभ पुरोहित ने भी लंबे समय तक हिंदी काव्य लेखन किया। मौजूदा समय में साहित्यकार शशि देवली हिंदी साहित्य के लिए समर्पित हैं। 

कुमाऊं के साहित्यकारों का भी रहा योगदान

ऊधमसिंह नगर: हिंदी को बढ़ावा देने में कई साहित्यकार जुटे
जिले में हिंदी के कवि और कथाकार आज भी शिद्दत से हिंदी को बढ़ावा देने में जुटे हैं। इनमें मुख्य रूप से देशभर में कविताओं के लिए चर्चित बल्ली सिंह चीमा, पहले कहानी संग्रह मेंढक से चर्चा में आए रिटायर्ड बैंक अधिकारी गंभीर सिंह पालनी शामिल हैं। डिग्री कॉलेज में हिंदी के विभागाध्यक्ष डॉ. शंभू दत्त पांडे शैलेय, कस्तूरी लाल तागरा, किरन अग्रवाल, सिद्धेश्वर सिंह सरीखे कवि और कथाकार शामिल है। इसके अलावा, रचनाओं के लिए चर्चा में रहने वाले युवा कवि डॉ. खेमकरण सोमन भी हैं। किसान और कवि बल्ली सिंह चीमा के दस कविता संग्रह छप चुके हैं। उनके लिखे गीत तमाम आंदोलनों में गाए जाते हैं।

पिथौरागढ़ : अनवरत साहित्य साधना में जुटे साहित्यकार
जिले के साहित्यकार अनवरत साहित्य साधना में जुटे हैं। उनकी इसी साधना की बदौलत हिंदी का भी विस्तार हो रहा है। साहित्यकार और शिक्षक डॉ. पीतांबर अवस्थी ने हिंदी और संस्कृत को बढ़ावा देने के उद्देश्य से वर्ष 2003 में पिथौरागढ़ के बजेटी में पुस्तकालय खोला। पुस्तकालय लोगों में हिंदी और साहित्य के प्रति लगाव बढ़ाने में सफल साबित हो रहा है। साहित्यकार और शिक्षक महेश चंद्र पुनेठा पढ़ने की संस्कृति के विकास के लिए गांव-गांव पुस्तकालय खोलने का अभियान चला रहे हैं। युवा लेखक साहित्यकार ललित शौर्य बच्चों में हिंदी पढ़ने की आदत बढ़ाने के लिए तीन हजार से अधिक बच्चों तक निशुल्क बाल साहित्य की किताबें बंटवा चुके हैं।

चंपावत : हिंदी साहित्य जगत को दी आंचलिक पहचान
जिले के खेतीखान गोशनी निवासी प्रसिद्ध साहित्यकार हिमांशु जोशी को सामाजिक ऊंच-नीच और जाति व्यवस्था पर प्रहार करने वाली उनकी साहित्यिक रचना कगार की आग (उपन्यास) ने जहां विश्व प्रसिद्धि दिलाई वहीं उन्होंने हिंदी साहित्य जगत को आंचलिक पहचान प्रदान करने में कामयाबी हासिल की थी। वर्ष 2018 में नई दिल्ली में रहते हुए उनका देहावसान हो गया था पर उनकी पुस्तकें हिंदी को बढ़ावा दे रहीं हैं। वर्तमान में डॉ.विष्णु दत्त शास्त्री सरल, कैलाश चंद्र लोहनी, डॉ.कीर्तिबल्लभ सक्टा, सुभाष जोशी, डॉ.बीसी जोशी, कुलदीप उप्रेती, डॉ.टीआर जोशी सहित अन्य साहित्यकार हिंदी साहित्य की सेवा कर रहे हैं।

अल्मोड़ा : जिले के साहित्यकारों का देश में है बड़ा नाम
जिले के साहित्यकारों ने साहित्य के क्षेत्र में पूरे देश में अमिट छाप छोड़ी है। इला चंद्र जोशी की शताब्दी 2003 में मनाई गई। हिंदी मनोवैज्ञानिक उपन्यास की शुरुआत करने वाले साहित्यकार इला चंद्र जोशी रहे। मनोहर श्याम जोशी उत्तर आधुनिक अवधारणा वाले कथाकार रहे। टीवी धारावाहिक ‘बुनियाद’, ‘हम लोग’ आदि की पटकथाएं उन्होंने लिखी। शैलेश मटियानी ने आंचलिक कथा साहित्य के क्षेत्र में विशेष योगदान दिया। पंकज बिष्ट, सुमन बिष्ट, संजय खाती, शेखर जोशी, बलवंत मनराल, पानू खोलिया, शेर सिंह बिष्ट (अनपढ़), गिरीश तिवारी गिर्दा, चारू चंद्र पांडे, प्रो. शेर सिंह बिष्ट, क्षितिज शर्मा, सल्ट क्षेत्र के के हीरा सिंह राणा, मथुरा दत्त मठपाल समेत कई बड़े नाम हैं जो हिंदी साहित्य को बढ़ावा देने में जुटे हैं।

बागेश्वर : सुमित्रानंदन पंत ने हिंदी को दो नई उड़ान
प्रकृति की गोद में बसे कौसानी की धरती ने सुमित्रानंदन पंत के रूप में देश को छायावादी, प्रगतिवादी, अध्यात्मवादी कवि दिया। पद्मभूषण पंत का संपूर्ण जीवन रचना में रत रहा। अविवाहित पंत जी की रचनाओं में नारी और प्रकृति के प्रति सौंदर्यपरक भावना की झलक मिलती है। पंत जी की स्वर्णकिरण, स्वर्णधूलि, वाणी, पल्लव, युगांत, उच्छ्वास, ग्रन्थि, गुंजन, ग्राम्या, कला और बूढ़ा चांद, लोकायतन, चिदंबरा, सत्यकाम प्रमुख रचनाएं रहीं हैं। सुमित्रानंदन पंत की परिपाटी को जिले के साहित्यकारों में केशवानंद जोशी, डॉ. राजीव जोशी, डॉ. गोपाल कृष्ण जोशी, गोपाल दत्त भट्ट, मोहन जोशी जैसे लोग बढ़ा रहे हैं।

नैनीताल : ‘बटरोही’ गिर्दा की परंपरा को बढ़ा रहे आगे
नैनीताल जिले में वर्तमान साहित्यकार प्रो. लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’, प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, डॉ. प्रयाग पांडे, दिनेश कर्नाटक, स्वाति मेलकानी, मोहन सिंह रावत (सदस्य, उत्तराखंड भाषा संस्थान), दिनेश उपाध्याय, संतोष कुमार तिवारी आदि सभी प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं। ये सभी हिंदी को अपनी कलम की स्याही से सींच रहे हैं। प्रमुख हिंदी साहित्यकार गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’, प्रेम सिंह नेगी, शैलेश मटियानी की परंपरा को उक्त सभी साहित्यकार आगे बढ़ा रहे हैं। हल्द्वानी क्षेत्र से आधारशिला के संपादक स्व. दिवाकर भट्ट ने हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में पहचान दिलाने के लिए कई दशक तक कार्य किया। उत्तराखंड भाषा संस्थान के सचिव मोहन सिंह रावत ने बताया कि कुमाऊं विवि की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ अपने स्थापना वर्ष 2005 से हिंदी को बढ़ावा देने के प्रयास में अनवरत जुटी है। 
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