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हिंदी हैं हम अभियान: हिंदी की साहित्य शिला पर देवभूमि के युवा लिख रहे अमिट लेख

Mon, 13 Sep 2021 11:28 PM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Mon, 13 Sep 2021 11:28 PM IST
सार

Hindi Diwas 2021: हिंदी दिवस की पूर्व संख्या पर अमर उजाला के मंच से शहर के युवा कवियों ने स्वरचित कविताओं के जरिए हिंदी के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। कवि प्रदीप फरस्वाण ने आत्मगौरव से छलकी प्रस्तुति देकर काव्य पाठ का शुभारंभ किया। 

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Hindi Diwas 2021 Hindi Hain Hum News: Seminar on Hindi Kavya in Amar Ujala Dehradun
हिंदी हैं हम अभियान के अंतर्गत काव्य गोष्ठी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिंदी है तो माथे पर तेरे भी शौर्य खिलेगा, कि हिंदी को जो भूलेगा वो हिंदुस्तान को भूलेगा, कहो फिर आन बान शान या फिर काम की भाषा हिंदी, कि हिंदी है तो जग सारा ये हिंदुस्तान बोलेगा... देवभूमि की माटी से नई पीढ़ी के कवि हिंदी का परचम फहरा रहे हैं। हिंदी हैं हम अभियान के तहत आयोजित अमर उजाला काव्य गोष्ठी में सोमवार को शहर के युवा कवियों ने स्वरचित कविताएं पेश कीं।

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हिंदी हैं हम: अहिंदी भाषी लोग शान से फहरा रहे हिंदी का परचम, बढ़ावा देने के लिए दोस्तों को भी कर रहे प्रेरित
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हिंदी दिवस की पूर्व संख्या पर अमर उजाला के मंच से शहर के युवा कवियों ने स्वरचित कविताओं के जरिए हिंदी के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। कवि प्रदीप फरस्वाण ने आत्मगौरव से छलकी प्रस्तुति देकर काव्य पाठ का शुभारंभ किया। कविता के जरिए उन्होंने बेहद खूबसूरती से उत्तराखंड का अद्भुत परिचय सबके सामने रखा। इसके बाद सिमरन दिवाकर ने अपने परिवेश की विसंगतियों की ओर इशारा करती हुई कविताएं पढ़ीं। हिंदी भाषा की ताकत को बताने के साथ ही जीवन के कुछ संदेश और उत्साह भरने वाली कविताएं खुशबू गैरोला की ओर से पेश की गईं।
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इसके बाद फूल के साथ प्यारा संवाद और हिंदी को लेकर विचारधारा पर आयुष बगवाड़ी ने अपनी कविताएं पढ़ीं। अमर उजाला के मंच से युवा कवियों ने इशारा दिया कि हिंदी भाषा के प्रति शहर के युवाओं में न केवल सम्मान है, बल्कि रुझान भी तेजी से बढ़ा है। अपनी कविताओं के जरिए हिंदी सेवा की उनकी यह यात्रा लगातार जारी रहेगी।

हिंदी अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा माध्यम : प्रदीप

हमारे पास आज अभिव्यक्ति के बहुत सारे माध्यम हैं। उनमें से एक सशक्त माध्यम मुझे कविताएं लगती हैं। मैं अपनी बात को कविताओं के जरिए ही रखने में ज्यादा सहज होता हूं। इससे मेरा हुनर भी दिखता है और मेरी पहचान भी बन रही है। अपनी कोई भी कविता जब मैं किसी मंच पर सुनाता हूं। तो मुझे लगता है कि मेरा लेखन सार्थक हो गया। स्नातक शिक्षण काल में ही मैंने लिखना शुरू किया। धीर-धीरे ज्ञान और अनुभव मिलता रहा, जिससे मेरा लेखन निरंतर निखरता गया। अपनी गढ़वाली बोली में लिखी कविताओं और गीतों के जरिए मैं अपने क्षेत्र के लोगों के दिलों में जगह बना पाया हूं, लेकिन हिंदी रचित कविताओं के जरिए मुझे सुनने वालों को दायरा बढ़ गया है। मैं ज्यादा लोगों तक हिंदी के जरिए पहुंच सका।

स्कूल में लिखी पहली कविता से आया आत्मविश्वास : खुशबू
मुझे लगता है कि स्कूल समय में हमारे बीच में कई ऐसे बच्चे होते हैं जो बहुत अच्छा लिखते हैं। मेरी पहली कविता जो मैंने स्कूल समय में लिखी थी, उसे सभी ने बहुत पसंद किया। मुझे यकीन नहीं था कि मेरी कविता को इतना प्यार मिलेगा। स्कूल प्रबंधन की ओर से उसे प्रकाशित करने के लिए भेजा गया। तभी से मुझमें आत्मविश्वास आया। इसके बाद में कभी-कभी कुछ लिखती थी, लेकिन बहुत सक्रिय नहीं थी। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान मैंने फिर लिखना शुरू किया। जो भी मेरे ख्याल होते थे, उन्हें कागज पर उतार देती थी। मेरी कविता को सुंदर बनाते थे, हिंदी के शब्दकोश, जिनमें बहुत ताकत है। अंग्रेजी भले ही पढ़ती रही हूं, लेकिन जितना अच्छा मैं हिंदी सोचती, लिखती या कह पाती हूं। वो मैं किसी और भाषा में नहीं कह सकती। इसलिए मुझे गर्व है कि मैं हिंदी की कवि हूं।

हिंदी में सबसे अच्छे नंबर लाने पर शाबाशी क्यों नहीं : आयुष
मैं उन विद्यार्थियों में से था, जिनके हिंदी में ही सबसे ज्यादा नंबर आते थे। हमारा परसेंटेज भी हिंदी की ही वजह से बढ़ता था, लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि हिंदी में ज्यादा नंबर आने पर कोई सराहना नहीं होती थी। हां, अगर साइंस में अच्छे नंबर आए हैं तो आपको शाबाशी मिलेगी। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान अंग्रेजी ही पढ़नी थी। मेरे जैसे कई हिंदी मीडियम से पढ़े बच्चे इंजीनियरिंग के लिए आए थे। धीरे-धीरे सभी की अंग्रेजी तो अच्छी हो गई, लेकिन हिंदी पीछे छूटती चली गई। हिंदी का उच्चारण सही हो न हो, लेकिन अंग्रेजी का उच्चारण सही होने पर सबका जोर रहा, लेकिन मैं तो मन से कवि था और अच्छा कवि वही बन सकता है जो अपने विचारों को बेहतर ढंग से कागज पर उतार सके। भले ही शिक्षकों के सामने और अच्छे नंबर लाने के लिए मैंने बहुत मेहनत कर अंग्रेजी पर अपनी पकड़ बनाई, लेकिन मेरी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम हिंदी ही बनी। अपनी कविताओं के जरिए मुझे आज लोगों से प्यार मिलता है। यह हिंदी की ही ताकत है।

हिंदी ने ही दी मुझे आज युवा कवि की पहचान : सिमरन
अंग्रेजी थोड़ी कमजोर है मेरी, लेकिन हिंदी पर मैं गुमान करती हूं। मैंने अपनी इसी रचना के जरिए खुद के अंदर भी आत्मविश्वास जगाया है। मेरी मातृभाषा की ही तो ये ताकत है, जिसने मुझे एक युवा कवि बनने का मौका दिया। कुछ समय पहले ही मैंने कविताएं लिखनी शुरू की थीं। तब मुझे वास्तव में यकीन नहीं था, कि जो मैंने लिखा है उसे लोग पसंद करेंगे। पहली कविता जब मैंने मंच पर सुनाई, उसके बाद यह सिलसिला रुका नहीं। हिंदी कविताओं के जरिए मैंने अपने विचारों को न सिर्फ कागज पर उतारा, बल्कि अपनी पहचान बनाने के दरवाजे भी खोले। मुझे लगता है कि हमारी भाषा, हमारी संस्कृति जो पहचान हमें देती है, वो हम किसी और भाषा या संस्कृति को अपनाकर नहीं पा सकते। इसलिए यह जिम्मेदारी हम सबकी है, कि हम अपनी मातृभाषा को बोलने में हिचकिचाएं नहीं।

युवा कवियों की ये पंक्तियां सराही गईं 

जिस भूमि से लगी उम्मीदें, जोत जली हो जहां अखंड
सभी गुणी ज्ञानी जहां आए, ऐसा है हमारा उत्तराखंड।
- प्रदीप फरस्वाण

अंग्रेजी थोड़ी कमजोर है मेरी, लेकिन हिंदी पर मैं गुमान रखती हूं।
तुम नहीं सभ्यता का पर मैं अपनी मातृभाषा का मान रखती हूं।
- सिमरन दिवाकर

मछली जल की रानी है पर खतरे में अब पानी है,
पानी बचाओ की तस्वीरें और यही असल कहानी है।
- खुशबू गैरोला

एक पुष्प को देख नयन मैंने बांध लिए, उसी से प्यारा सा, वह रंग बिरंगा देख उसकी छटा,
पड़ गया मैं सोच में पुष्प से मैंने पूछा, क्या तू मेरा मित्र बनेगा? मेरे जीवन का इत्र बनेगा?
- आयुष बगवाड़ी 

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