हिमालय में फूलों, पौधों से लेकर तितलियों के संसार पर संकट
काल यात्रा की एक विज्ञान कथा हमें बताती है कि हमें जैव विविध क्षेत्र क्यों संरक्षित करने चाहिए। अमेरिकी लेखक रे ब्रेडबरी की कहानी ‘साउंड ऑफ थंडर’ में कई हजार साल पहले काल यात्रा पर निकला एक व्यक्ति एक तितली को मार देता है और भविष्य बदल जाता है। इसी तरह जैव विविध क्षेत्र हैं जो पेड़, पौधों, फूलों, सूक्ष्मजीवियों, वन्यजीवों, पक्षियों के भरे पूरे संसार को संरक्षित किए हुए हैं। इन जैव विविध क्षेत्रों पर आया कोई भी संकट हमारे जीवन पर आए संकट का ही संकेत हैं। कुछ समय के लिए यह हमारे वर्तमान में इसका अहसास न हो, लेकिन यकीनन हमारा भविष्य जरूर बदल जाएगा। राष्ट्रीय उद्यानों, पार्कों, वन्यजीव विहार, बायोस्फीयर क्षेत्र के जरिए इनके संरक्षण की कोशिश है। आज की भागमभाग जिंदगी में संरक्षण की यह कोशिश नाकाफी साबित हो रही है। हिमालय दिवस के संकल्प में एक संकल्प यह भी लिए जाने की जरूरत है-...ताकी हिमालय बचा रहे और हम भी बचे रहें।
जैव विविधता के संरक्षण के लिए और अधिक कोशिश करने की है जरूरत
फूलों, पौधों से लेकर तितलियों तक के संसार पर संकट है। इन्हें बचाने की कोशिश भी हो रही है, लेकिन संरक्षण के लिए जितनी कोशिश होनी चाहिए, वह हो नहीं रही है। विशेषज्ञों की मानें तो हम पहले ही बहुत देर कर चुके हैं। पलक झपकने में ही एक प्रजाति किसी न किसी तरह से दुनिया से गायब हो जा रही है। प्रदेश में वैसे जैव विविध क्षेत्रों के संरक्षण के लिए करीब 14 राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव विहार आदि गठित किए जा चुके हैं। इन क्षेत्रों से बाहर भी कई जैव विविध क्षेत्र हैं, जिनके संरक्षण के लिए कोशिश न के बराबर हो रही है। मसलन अभी तक प्रदेश में यह तक साफ नहीं हो पाया है कि आद्र भूमि (वैटलैंड) की स्थिति क्या है। इसके लिए अब भारतीय वन्य जीव संस्थान ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के सहयोग से संरक्षण का अभियान चलाने और आद्र भूमियों की सेहत नापने का काम जरूर शुरू किया है। इसी तरह जैव विविध बोर्ड लोगों को साथ लेकर संसाधनों की सुरक्षा के लिए प्रबंध कमेटियों का गठन कर रहा है। इतना होने पर भी इंटरनेशनल यूनियन फॉर कनजर्वेशन ऑफ नेचर के मुताबिक फूलों की 101 प्रजातियां संकटग्रस्त हैं।
जैव विविध क्षेत्रों के संरक्षण की जरूरत क्यों हैं?
- जैव विविध क्षेत्र जीवन प्रणाली को बचाए रखने के लिए जरूरी हैं। जैव विविध क्षेत्र में वन्यजीव, पानी, सूक्ष्मजीव, पेड़, पौधे आदि कई घटक हैं। इन्हें बनने और परस्पर सह संबंध बनाने में करोड़ों साल लगे। अचानक कोई गायब हो तो वर्तमान में भले ही पता न लगे लेकिन भविष्य जरूर प्रभावित होगा। पारिस्थितिकी तंत्र में जैव विविध क्षेत्रों की एक खास भूमिका है।
- संरक्षण के उपाय क्या हैं?
राष्ट्रीय उद्यान, पार्क, वन्यजीव विहार, आद्र भूमि आदि को संरक्षित किया जा रहा है और यह प्रक्रिया लगातार जारी है। इसी तरह जैव विविधता को संरक्षित करने के लिए बायो डायवर्सिटी बोर्ड की ओर से भी कोशिश हो रही है। अब तक 7981 में से 5529 जैव विविधता प्रबंधन समितियों का गठन किया जा चुका है।
- संरक्षण की वर्तमान कोशिश से आप संतुष्ट हैं?
हम पहले ही देर कर चुके हैं। हमें नहीं पता कि किसी एक प्राणि के विलुप्त होने का जीवन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। डायनासोर लाखों सालों की प्रक्रिया में गायब हुए। प्रकृति को समय मिल गया तो उसने संतुलन स्थापित करने का तरीका खोज निकाला। आज के समय में पलक झपकने में एक स्पीसिज गायब हो जाती है। हम प्रकृति को संभलने का मौका तक नहीं दे रहे हैं।
- विकास और संरक्षण में संतुलन कैसे स्थापित हो?
कोशिश यह हो कि नुकसान न्यूनतम किया जाए। जापान में सड़क बनते समय एक पत्थर इधर से उधर हो जाए तो भारी जुर्माना लगता है। जापान भी पर्वतीय देश है। मैं चीन गया था। मैंने एक 500 किलोमीटर की नई सड़क, जिसमें कई सुरंगें बनी थीं, देखीं। मैंने देखा कि अगर ओवरब्रिज के लिए कोई खंभा बना है तो एक इंच भी मिट्टी कहीं बिखरी हुई दिखाई नहीं दी।
(एसएस रसाईली, सचिव, उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड से बातचीत)
हिमाचल....
देश में पाई जाने वाली पौधों की 47000 प्रजातियों में से करीब 3295 प्रजातियां हिमाचल प्रदेश में पाई जाती हैं। यहां पाई जाने वाले पादपों और वन्यजीवों में से 95 प्रतिशत स्थानीय हैं। पक्षियों की 447 प्रजातियां और मछलियों की 83 प्रजातियां यहां पाई जाती हैं। फूलों में 3120 ओनजियोस्पर्म और 13 जिमनोस्पर्म हैं। उत्तराखंड और जम्मू कश्मीर की तरह ही हिमाचल भी औषधीय वनस्पति के मामले में धनी है। औषधीय पौधों का अत्यधिक दोहन यहां भी समस्या खड़ी कर रहा है। औषधीय पौधों की करीब 60 प्रजातियां यहां संकटग्रस्त हैं।
संरक्षण की कोशिश..
पांच राष्ट्रीय उद्यान, 31 वन्यजीव विहार, चंद्राताल
जम्मू कश्मीर...
अन्य हिमालयी राज्यों की तरह जम्मू कश्मीर भी जैव विविधता के मामले में धनी है। यहां फूलों की 3054 प्रजातियां रिपोर्ट की गईं हैं। इसमें से 880 लद्दाख क्षेत्र में पाई जाती हैं। इस क्षेत्र को सगंध पादपों और औषधीय पौधों का भंडार भी कहा जाता है। इनमें से 55 प्रजातियों को महत्वपूर्ण माना जाता है। जम्मू क्षेत्र में करीब 506 फूलों की प्रजातियों की पहचान की गई है।
संरक्षण की कोशिश...
चार राष्ट्रीय उद्यान, 14 वन्यजीव विहार
उत्तराखंड...
वैज्ञानिक शोधों के मुताबिक उत्तराखंड के जैव विविध क्षेत्र में फूलोें की 213 फैमिली, 1503 जेनेरा हैं। इसमें 93 प्रजातियां संकटग्रस्त हैं। फर्न की 487 प्रजातियां हैं और इसमें से 15 स्थानीय हैं। वन्यजीवों की 3748 प्रजातियों की अभी तक पहचान की जा चुकी है। इनमें से 451 प्रजातियों को पहली बार रिपोर्ट किया गया है। 3748 में से 35 स्थानीय हैं। प्रदेश में पक्षियों की 743 प्रजातियां और 439 प्रजातियां तितलियों की हैं। आसाम के बाद सबसे अधिक माइग्रेटरी पक्षी उत्तराखंड पहुंचते हैं। यहां पौधों की 7000 प्रजातियों के होने का अनुमान है, जिसमें से करीब 85 प्रतिशत की ही पहचान हो पाई है। 700 औषधीय वनस्पतियां हैं।
संरक्षण के लिए कोशिश...
छह राष्ट्रीय उद्यान, सात वन्यजीव विहार, एक संरक्षित क्षेत्र, एक बाघ संरक्षण क्षेत्र
क्या है जैव विविध क्षेत्र...
जैव विविधता को उस क्षेत्र की पारिस्थितिकी के स्वास्थ्य का सूचक कहा जा सकता है। ऐसा क्षेत्र जहां पेड़, पौधों, फूलों से लेकर वन्य जीवों, सूक्ष्मजीवियों की भरमार है। ये सब मिलकर हमें साफ हवा और पानी तथा अन्य पर्यावरणीय सेवाएं देते हैं। ये सभी एक दूसरे पर निर्भर हैं और परस्पर मिलकर जैव विविध क्षेत्र का निर्माण करते हैं। दुनिया के 25 अति महत्वपूर्ण जैव विविध क्षेत्रों में भारत के दो क्षेत्र शामिल है। पहला पश्चिमी घाट और दूसरा हिमालय।