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उत्तराखंड में भाजपा की ताकत ही बने उसकी कमजोरी

Sun, 15 Jan 2017 12:49 PM IST
अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून
अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून Updated Sun, 15 Jan 2017 12:49 PM IST
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high profile leader in uttarakhand bjp.
अमित शाह के साथ प्रदेश भाजपा के दिग्गज - फोटो : file photo

उत्तराखंड में हेवीवेट नेताओं से लैस भाजपा की जो ताकत है, वही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी मानी जा रही है। यही वजह है कि चुनावी समर में उतरने से लेकर चुनावी यात्रा के समापन तक पार्टी को दिग्गजों के लिए अलग से प्लानिंग करनी पड़ रही है।

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इस बार बगैर चेहरे के समर में उतरी भाजपा के लिए सिर्फ खंडूड़ी ही जरूरी नहीं हैं, बल्कि उसे कोश्यारी, निशंक, बहुगुणा के साथ अजय टम्टा और सतपाल महाराज को भी तरजीह देनी है। इन सबको मैनेज करने के चक्कर में प्रदेश में पार्टी कार्यकर्ता से लेकर वोटर चेहरे और मोहरे को लेकर कन्फ्यूजन में हैं। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस में शुरू से लेकर अंत तक तस्वीर एकदम साफ है कि उसके इलेक्शन कैम्पेन और सीएम का चेहरा कौन होगा।
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कई दिग्गजों के चेहरे होने के बावजूद भाजपा ने मुख्यमंत्री के रूप में किसी को प्रोजेक्ट नहीं करके एक चीज साफ कर दी है कि वह किसी भी कीमत पर चुनाव होने तक किसी तरह का ‘गृहयुद्ध’ नहीं चाहती है। ऐसे में लाजमी है कि पार्टी इनके भरोसे प्रचार अभियान नहीं चलाएगी।
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हालांकि इन्हें प्रचार अभियान का अहम हिस्सा बनाएगी और अपनी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल भी करेगी, लेकिन वह भी इतना आसान है नहीं, जितना देखने से नजर आता है।

कांग्रेस में केवल सीएम रावत का चेहरा होने से टकराव कम

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harish rawat

गढ़वाल में पूर्व सीएम बीसी खंडूड़ी, रमेश पोखरियाल निशंक, विजय बहुगुणा, सतपाल महाराज और हरक सिंह रावत के चलते खुद को मजबूत मान रही भाजपा के लिए टिकट वितरण के बाद इनका इस्तेमाल करना आसान नहीं रहेगा। अगर खंडूड़ी को तरजीह देते हैं तो निशंक, सतपाल, हरक और विजय बहुगुणा का इस्तेमाल कैसे होगा, पार्टी को इस सवाल का जवाब तलाशना है। 

इन सभी के प्रभाव वाले क्षेत्र एक दूसरे से टकराते हैं, ऐसे में क्षत्रपों से किसी एक को मिली तरजीह या अलग-अलग जिम्मेदारी बांटने पर भी टकराव होने की आशंका बनी रहेगी। कुमाऊं में पूर्व सीएम भगत सिंह कोश्यारी के अनुभवों का इस्तेमाल करने पर वहां अजय भट्ट, अजय टम्टा का उपयोग कैसे होगा इसपर भी मंथन करना पड़ रहा है।

दूसरी ओर तरफ कांग्रेस में दिग्गजों के नाम पर सीएम हरीश रावत का चेहरा ही अब तक सामने है, जिससे पार्टी में टकराव कम है। प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय के साथ तालमेल बैठाने भर की चुनौती रावत के सामने है।

टक्कर देने को तैयार हैं नए चेहरे
पार्टी में पूर्व मुख्यमंत्रियों और अन्य कुछ दिग्गज ही नहीं बल्कि दूसरी पंक्ति के नेता भी खुद के लिए स्पेस ढूंढ रहे हैं। सीएम चेहरा नहीं देने वाले राज्यों महाराष्ट्र, हरियाणा आदि से जोड़कर देखा जाए तो उत्तराखंड में भी सरकार बनने के स्थिति के बाद किसे गद्दी मिलेगी इसका सस्पेंस दूसरी पंक्ति के नेताओं के अरमानों को हवा दे रहा है। प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट, त्रिवेंद्र सिंह रावत, अनिल बलूनी, अजय टम्टा की महत्वाकांक्षाएं जोर मार रही हैं। उन्हें एक हद तक तरजीह भी मिल रही है। ऐसे में दिग्गजों और सेकेंड लीडरशिप के बीच शीतयुद्ध की स्थिति बनी हुई है।

दिग्गजों के करीबी भी मैदान में

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अमृता रावत सतपाल महाराज की पत्नी हैं। - फोटो : RajivGupta/AmarUjala

चार पूर्व सीएम बीसी खंडूड़ी, भगत सिंह कोश्यारी, विजय बहुगुणा और रमेश पोखरियाल निशंक से कोई भी चुनाव नहीं लड़ेगा, लेकिन इनमें से अधिकांश के करीबी या परिवारजन चुनाव में उतरने जा रहे हैं। खंडूड़ी की बेटी ऋतु खंडूड़ी चुनाव मैदान में उतरने को तैयार हैं। बहुगुणा के बेटे सौरभ का भी सितारगंज से टिकट पक्का माना जा रहा है। कोश्यारी के भतीजे की चुनाव में उतरने की चर्चा है। सतपाल महाराज के खुद और पत्नी अमृता रावत का लड़ना लगभग तय है। निशंक भी अपने कुछ करीबियों के लिए टिकट की पैरवी कर रहे हैं। इसके अलावा कांग्रेस से आए हरक सिंह रावत अपने साथ करीबियों की भी पैरवी करवा रहे हैं।

बागियों से स्थिति और पेचीदा
कांग्रेस के बागियों की टीम आने से स्थिति पेचीदा हो गई है। बागी पसंद की सीट चाहते हैं। हरक सिंह को लैंसडोन तो अमृता को चौबट्टाखाल विधानसभा से उतरना है। दोनों ही चेहरे बड़े हैं और गढ़वाल के बड़े हिस्से में दखल रखते हैं। उनको टिकट देने पर अपने मौजूदा विधायक को संतुष्ट करना पार्टी के लिए मुश्किलें बढ़ा देगा। नरेंद्र नगर में पूर्व भाजपा प्रत्याशी ओमगोपाल रावत और बागी सुबोध उनियाल से किसी एक का चयन आसान नहीं है। यह हाल बागियों वाली सीटें प्रदीप बत्रा की रुड़की और शैला रानी रावत की केदारनाथ का भी है।

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