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एक फैसले से कठघरे में आया एमडीडीए
अमर उजाला, प्रेम प्रताप सिंह, देहरादून
Updated Wed, 21 Aug 2013 03:58 PM IST
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कानून को धत्ता बताना एमडीडीए को भारी पड़ सकता है। नैनीताल हाईकोर्ट में मंगलवार को एक मुकदमे में महाधिवक्ता का दखल एमडीडीए पर भारी पड़ गया।
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अदालत ने एमडीडीए के गठन से लेकर अब तक हुए अवैध निर्माणों के विरुद्ध जारी सीलिंग और ढहाने के आदेश तथा की गई कार्रवाई का ब्योरा तलब कर लिया है।
इससे न केवल एमडीडीए बल्कि पूरी सरकार की फजीहत होनी तय है। प्रकरण देहरादून निवासी रतनमणि नौटियाल बनाम एमडीडीए का था।
हाईकोर्ट में सीलिंग का मामला
एमडीडीए की ओर से एक भवन के सीलिंग का मामला हाईकोर्ट में चल रहा है। मंगलवार को न्यायाधीश वीके बिष्ट की अदालत में नौटियाल की याचिका लिस्ट की गई थी।
दोनों पक्षों के वकील अपनी बात अदालत में रख रहे थे। बताया गया कि इसी बीच महाधिवक्ता ने अदालत में अपनी तरफ से कुछ बातें कहीं।
ब्योरा एफीडेविट में मांगा
महाधिवक्ता की बात पूरी होते ही न्यायाधीश ने एमडीडीए को निर्देशित किया कि अब तक कितने भवनों के विरुद्ध सीलिंग की कार्रवाई के आदेश हुए और कितने के विरुद्ध ढहाने के आदेश जारी किए गए, ऐसे प्रकरणों का ब्योरा एफीडेविट में दे जिनमें आदेशों का पालन किया गया।
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महाधिवक्ता के दखल से आफत में पड़े एमडीडीए के अधिकारी अब मामला शासन और सरकार में लेकर पहुंचे हैं। बताया गया कि महाधिवक्ता ने एमडीडीए के वकील की बात को ही नजरअंदाज कर दिया, जिसके चलते एमडीडीए का पूरा पक्ष अदालत के समक्ष आ ही नहीं पाया।
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दून में हैं 33 हजार अवैध निर्माण
एमडीडीए गठन से लेकर अब तक राजधानी में 33 हजार से अधिक अवैध निर्माण हो चुका है। इसमें से लगभग दो हजार मामलों में ही सीलिंग के और कुछ सौ प्रकरण में ध्वस्तीकरण के आदेश हुए हैं।
हजारों की संख्या में अवैध निर्माण के खिलाफ आज तक कोई फैसला नहीं किया गया है। ऐसे में अगर कोर्ट की ओर से सीलिंग और ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया जाता है तो पूरी सरकार हिल जाएगी।
मुख्यमंत्री के पास है महकमा
मुख्यमंत्री के पास ही है आवास विकास का महकमा। ऐसे में एमडीडीए के खिलाफ फैसला आने से कहीं न कहीं मुख्यमंत्री का सीधे जुड़ाव है। इस संबंध में आने वाले दिनों में विपक्ष भी मुख्यमंत्री के खिलाफ हमलावर हो सकता है।
कांग्रेसी विधायक कर रहे थे सिफारिश
अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने के लिए कांग्रेस के ही एक विधायक एमडीडीए से लेकर शासन तक में सिफारिश कर रहे थे, जिसके कारण आज तक कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही थी।
भारी दबाव के बाद जब एमडीडीए ने कार्रवाई की तैयारी की तो अवैध निर्माण करने वाले ने हाईकोर्ट की शरण ली, लेकिन यह एमडीडीए पर भारी पड़ा।