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हिमालय पुत्र हेमवती नंदन बहुगुणा के गांव में आज सिर्फ सन्नाटा, आठ परिवार हैं मौजूद
Thu, 25 Apr 2019 11:16 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal
संदीप थपलियाल, अमर उजाला, श्रीनगर
संदीप थपलियाल, अमर उजाला, श्रीनगर
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Thu, 25 Apr 2019 11:16 AM IST
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हेमवती नंदन बहुगुणा (फाइल फोटो)
- फोटो : गूगल
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पहाड़ की बेहतरी के लिए भले ही हिमालयपुत्र हेमवती नंदन बहुगुणा ने यूपी के जमाने में अलग मंत्रालय का एतिहासिक फैसला किया था, लेकिन आज उनका खुद का गांव बुघाणी पलायन के दर्द से कराह रहा है।
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हाल यह है कि कभी 80 परिवारों वाले इस समृद्ध गांव में आज की तारीख में आठ परिवारों के सिर्फ 14 लोग ही रह गए हैं। आज बहुगुणा की सौवीं जयंती पर उनके गांव की यह तस्वीर निश्चित तौर पर तकलीफ देने वाली है। एचएन बहुगुणा के पैतृक घर को संग्रहालय बना दिया गया है, लेकिन यह पहल भी इस गांव के सन्नाटे को नहीं तोड़ पा रही है।
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बुघाणी गांव ने देश को दो मुख्यमंत्री, सांसद और विधायक दिए हैं। एचएन बहुगुणा के बेटे विजय बहुगुणा उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, जबकि पौत्र सौरभ बहुगुणा सितारगंज से विधायक हैं। इसके बावजूद बुघाणी के दिन नहीं बहुरे। प्रदेश सरकार ने गांव को पहचान को बरकरार रखने के लिए वर्ष 2012 में एचएन बहुगुणा के पैतृक घर को संग्रहालय बनाने का निर्णय लिया।
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वर्ष 2013 में कार्यदायी संस्था लोक निर्माण विभाग को इसके लिए 2.93 करोड़ रुपये आवंटित कर दिए गए। लोनिवि ने यहां स्व. बहुगुणा से जुड़ी सामग्रियों का संरक्षण, पुराने घर का पुनरोद्धार, संग्रहालय निर्माण और संपर्क मार्ग का निर्माण करवाया है। 25 अप्रैल 2017 मेें एचएन बहुगुणा की जयंती पर प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के हाथों इसका शिलान्यास हुआ। उस दिन गांव में वर्षों बाद उनके बेटे-बेटियां और पौत्र एकत्रित हुए। मंत्रियों और अधिकारियों का जमघट लगा, लेकिन इसके बाद संग्रहालय में भी इक्का-दुक्का लोग ही पहुंचे।
एचएन बहुगुणा की स्मृति में कार्यक्रम आयोजित करने वाले पूर्व शिक्षक केपी उनियाल कहते हैं कि ‘बहुगुणा जी के कार्यकाल मेें सड़कों का जाल बिछा। प्राइवेट स्कूलों का प्रांतीयकरण हुआ’ है। गांव के निवासी पूर्व प्रधानाचार्य अनुसूया प्रसाद उनियाल बताते हैं कि जब एचएन बहुगुणा गांव आते थे, तो हजारों लोग उनके स्वागत को उमड़ पड़ते थे। जो भी उनसे मिलने आता था, वह बिना खाना खिलाए नहीं भेजते थे। चाहे वह यूपी के मुख्यमंत्री रहे हों या केंद्रीय मंत्री, वह हर साल गांव जरूर आते थे। वे आज के नेताओं की तरह नहीं थे। जब भी गांव आते थे, तो गढ़वाली में बात करते थे।
गांववालों के साथ जहां वह बैठते थे, वहां उनके निजी सहायक, सुरक्षा गार्ड या किसी अन्य सरकारी कर्मचारी को आने की इजाजत नहीं होती थी। बड़ा राजनीतिक कद होने के बावजूद उन्होंने कभी भी इसका आभास नहीं होने दिया। एचएन के भतीजे विपिन मोहन बहुगुणा बताते हैं कि उनके चाचा की अंतिम अभिलाषा थी कि 187 गांवों के लिए पेयजल योजना बनाई जाए। यह प्रस्ताव भटोली के तत्कालीन ग्राम प्रधान ने दिया था। उनका मानना था कि इतने बड़े क्षेत्र की प्यास अलकनंदा नदी ही बुझा सकती है। उनके निधन के 25 साल बाद ढिकवालगांव-खिर्सू पेयजल योजना पर काम हो रहा है।