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गर्मी में तबाह हुई फसल, मानसून में बन रही रिपोर्ट
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इस साल अप्रैल से जून माह के बीच बारिश का ग्राफ बहुत कम रहा। इससे जौनसार बावर में कई हेक्टेयर भूमि सूखे की भेंट चढ़ गई। सूखे को देखते हुए जून माह में उपजिलाधिकारी कालसी डॉ. अपूर्वा सिंह ने सभी राजस्व उपनिरीक्षकों को सूखे पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश दिए थे।
ताकि, सूखे का आकलन कर काश्तकारों को मुआवजा भुगतान किया जा सके, लेकिन राजस्व उपनिरीक्षकों ने इस आदेश को तवज्जों देना जरूरी नहीं समझा। नतीजतन अब तक एक भी गांव की सूखे की रिपोर्ट तैयार नहीं हो सकी है। अब मानसून शुरू हो चुका है, तो तहसील प्रशासन को इस आदेश पर अमल करने की याद आई है, लेकिन तहसीलकर्मी मानसून में सूखे का आकलन किस तकनीक से करेंगे इसका जवाब किसी के पास नहीं है। जौनसार बावर कृषि प्रधान क्षेत्र हैं। यहां पर लोगों की आमदनी पूरी तरह से कृषि और पशुपालन पर टिकी हुई है। इसमें से भी सबसे ज्यादा लोग पूरी तरह से खेती-बाड़ी पर निर्भर हैं।
सिंचाई के कम साधन होने के कारण पूरी खेती बाड़ी बारिश पर निर्भर है, लेकिन इस साल गर्मियों में बारिश नाम मात्र के लिए हुई। इस कारण क्षेत्र के एक बड़े क्षेत्रफल में खड़ी फसल पूरी तरह से बर्बाद हो गई। ग्रामीणों की मानें तो इस बार करीब 60 प्रतिशत भूमि सूखे की भेंट चढ़ गई, लेकिन प्रभावितों को मुआवजा देने के लिए सरकारी कागजों में फसलों को कितना नुकसान पहुंचा इसका जवाब तहसील प्रशासन के पास नहीं है।
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काश्तकारों में रोष
काश्तकार परम सिंह, नारायण सिंह, रण सिंह चौहान, पूरण सिंह आदि का कहना है कि जून में उपजिलाधिकारी ने सभी राजस्व उपनिरीक्षकों को निर्देश जारी कर सूखे की रिपोर्ट तैयार कर तहसील में जमा कराने के निर्देश दिए थे, लेकिन किसी भी राजस्व उपनिरीक्षक ने आदेशों को तवज्जों देना जरूरी नहीं समझा। इस कारण अब तक एक भी राजस्व क्षेत्र में यह रिपोर्ट तैयार नहीं हो सकी है। आरोप लगाया कि तहसील प्रशासन की हीलाहवाली का खामियाजा इस बार काश्तकारों को भुगतना पड़ेगा।
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ये फसलें हुई तबाह
अप्रैल-जून के बीच कम बारिश के चलते इस साल काश्तकारों की अदरक, अरबी (गागली), शिमला मिर्च, आलू, टमाटर, हरी मिर्च, हरा धनियां, मक्का की फसल सूखे की भेंट चढ़ गई। ये वे फसलें हैं जिनकी क्षेत्र में बहुतायत में खेती की जाती है।
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मामले में सभी राजस्व उपनिरीक्षकों का स्पष्टीकरण तलब किया गया है। स्प्ष्टीकरण से संतुष्ट नहीं होने पर सभी कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
-डॉ. अपूर्वा सिंह, उपजिलाधिकारी, कालसी
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ताकि, सूखे का आकलन कर काश्तकारों को मुआवजा भुगतान किया जा सके, लेकिन राजस्व उपनिरीक्षकों ने इस आदेश को तवज्जों देना जरूरी नहीं समझा। नतीजतन अब तक एक भी गांव की सूखे की रिपोर्ट तैयार नहीं हो सकी है। अब मानसून शुरू हो चुका है, तो तहसील प्रशासन को इस आदेश पर अमल करने की याद आई है, लेकिन तहसीलकर्मी मानसून में सूखे का आकलन किस तकनीक से करेंगे इसका जवाब किसी के पास नहीं है। जौनसार बावर कृषि प्रधान क्षेत्र हैं। यहां पर लोगों की आमदनी पूरी तरह से कृषि और पशुपालन पर टिकी हुई है। इसमें से भी सबसे ज्यादा लोग पूरी तरह से खेती-बाड़ी पर निर्भर हैं।
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सिंचाई के कम साधन होने के कारण पूरी खेती बाड़ी बारिश पर निर्भर है, लेकिन इस साल गर्मियों में बारिश नाम मात्र के लिए हुई। इस कारण क्षेत्र के एक बड़े क्षेत्रफल में खड़ी फसल पूरी तरह से बर्बाद हो गई। ग्रामीणों की मानें तो इस बार करीब 60 प्रतिशत भूमि सूखे की भेंट चढ़ गई, लेकिन प्रभावितों को मुआवजा देने के लिए सरकारी कागजों में फसलों को कितना नुकसान पहुंचा इसका जवाब तहसील प्रशासन के पास नहीं है।
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काश्तकारों में रोष
काश्तकार परम सिंह, नारायण सिंह, रण सिंह चौहान, पूरण सिंह आदि का कहना है कि जून में उपजिलाधिकारी ने सभी राजस्व उपनिरीक्षकों को निर्देश जारी कर सूखे की रिपोर्ट तैयार कर तहसील में जमा कराने के निर्देश दिए थे, लेकिन किसी भी राजस्व उपनिरीक्षक ने आदेशों को तवज्जों देना जरूरी नहीं समझा। इस कारण अब तक एक भी राजस्व क्षेत्र में यह रिपोर्ट तैयार नहीं हो सकी है। आरोप लगाया कि तहसील प्रशासन की हीलाहवाली का खामियाजा इस बार काश्तकारों को भुगतना पड़ेगा।
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ये फसलें हुई तबाह
अप्रैल-जून के बीच कम बारिश के चलते इस साल काश्तकारों की अदरक, अरबी (गागली), शिमला मिर्च, आलू, टमाटर, हरी मिर्च, हरा धनियां, मक्का की फसल सूखे की भेंट चढ़ गई। ये वे फसलें हैं जिनकी क्षेत्र में बहुतायत में खेती की जाती है।
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मामले में सभी राजस्व उपनिरीक्षकों का स्पष्टीकरण तलब किया गया है। स्प्ष्टीकरण से संतुष्ट नहीं होने पर सभी कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
-डॉ. अपूर्वा सिंह, उपजिलाधिकारी, कालसी