सीएम बने रहने के लिए रावत ने किया 'घर' का रुख
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लोकसभा चुनाव में खाली हुई डोईवाला या फिर खाली कराई गई धारचूला सीट से चुनाव लड़ें, लंबी पसोपेश के बाद सीएम हरीश रावत को कुमाऊं लौटना ही पड़ा।
दोनों सीटों से लड़ने की उनकी योजना पर पार्टी की मुहर नहीं लगी। अन्य नेताओं के विरोध के कारण उन्होंने डोईवाला से मोह त्याग दिया। सीएम ने दोनों सीटों पर जो गुप्त सर्वे कराया था, उसमें भी धारचूला पर ही पॉजिटिव रिपोर्ट आई।
अपने पुराने संसदीय क्षेत्र अल्मोड़ा से ताल्लुक रखने वाले धारचूला विधानसभा क्षेत्र के लिए हरीश रावत नए नहीं हैं।
धारचूला पर थी रावत की नजर
धारचूला कांग्रेस का गढ़ है और लोकसभा के नतीजों में यहां से पार्टी जीती है। डोईवाला की तरह यहां गुटबाजी भी नहीं होगी। रावत को कहीं न कहीं डोईवाला सीट पर संशय भी था, इसीलिए धारचूला सीट खाली कराई थी।
सरकार ने हाल ही में धारचूला और आसपास के इलाकों के लिए कई घोषणाएं की थीं, साफ था कि रावत की नजर धारचूला पर ही है।
डोईवाला सीट पाने के लिए हीरा सिंह बिष्ट ने मुखर होकर यहां से सीएम की उम्मीदवारी का विरोध किया। 2012 में बिष्ट रायपुर सीट से लड़ना चाहते थे पर उन्हें डोईवाला से टिकट मिला और करीब 1700 वोटों से हार गए।
हार को पाटना होगा
बिष्ट दो बार लोकसभा का चुनाव भी हारे हैं। दो बार 1985 और 2002 में विधानसभा चुनाव जीते हैं। 2007 में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा।
डोईवाला फतेह करने के लिए उन्हें अब 1700 नहीं बल्कि लोकसभा चुनाव में हुई 22 हजार वोटों की हार को पाटना होगा। यहां सबसे अधिक नेता टिकट मांग रहे थे, सबको जोड़ना भी चुनौती होगी।
कांग्रेस के लिए सुरक्षित सीट सोमेश्वर मजबूत हो गई है। रेखा आर्य 2012 में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर दूसरे स्थान पर रही थीं। सोमेश्वर भाजपा का गढ़ है, जिसमें सेंध लगाने में उन्हें खासी मशक्कत करनी होगी।