तो क्या सच में खनन कारोबारियों पर मेहरबान है उत्तराखंड सरकार
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उत्तराखंड के खनन कारोबारियों, स्टोन क्रशर संचालकों पर सरकार और खनन विभाग के आला अफसर खासे मेहरबान है।
पिछले साल सरकार की ओर से जारी की गई ‘स्टोन क्रशर अनुज्ञा नीति- 2015’ लागू होने के एक साल बाद भी खनन विभाग के अफसर स्टोन क्रशर्स को क्लस्टर में शिफ्ट नहीं करवा पाए हैं।
उन्हें 30 जून तक अपने खर्च पर क्लस्टर विकसित करने थे, लेकिन अब एक माह की मोहलत और दे दी गई है। सरकार और खनन अफसरों के इस ढुलमुल रवैये को लेकर सवालिया निशान उठ रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि सरकार ने राज्य के विभिन्न इलाकों में संचालित स्टोन क्रशर को लेकर पिछले साल ‘स्टोन क्रशर अनुज्ञा नीति- 2015’ लागू की। इस नीति में यह प्रावधान किया गया कि राज्य भर के स्टोर क्रशर अपने खर्च पर क्लस्टर विकसित करेंगे।
निर्धारित प्रावधानों के विपरीत संचालित हो रहे हैं स्टोन क्रशर
30 जून 2016 से पहले अलग-अलग इलाकों में ये क्लस्टर विकसित होंगे, जहां सभी स्टोन क्रशर को स्थानांतरित किया जाएगा। जो भी स्टोन क्रशर क्लस्टर में नहीं स्थानांतरित होंगे, उन्हें निर्धारित प्रावधानों के तहत बंद करा दिया जाएगा।
चौंकाने वाली बात यह है कि नीति लागू होने के एक साल बाद भी सरकार के सख्त दिशा निर्देशों के बावजूद विभागीय अफसर स्टोन क्रशर्स को नदियों की कोख से स्थानांतरित कराना तो दूर, क्लस्टर तक नहीं विकसित करवा पाए है।
सूत्रों की मानें तो क्लस्टर विकसित कर स्टोन क्रशर्स को इनमें स्थानांतरित करने के लिए एक माह की ओर मोहलत देने का निर्णय सरकार और आला अफसरों ने स्टोर क्रशर संचालकों के दबाव में आकर लिया है। उल्लेखनीय है कि राज्य के विभिन्न इलाकों में सैकड़ों की तादात में ऐसे स्टोन क्रशर हैं जो निर्धारित प्रावधानों के विपरीत संचालित हो रहे हैं।
इन अनाधिकृत स्टोन क्रशर्स को लेकर विधानसभा से लेकर सरकार के स्तर पर आवाजें उठी हैं। लेकिन क्रशर संचालकों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई कभी नहीं हो पाई। पिछले दिनों जब मीडियाकर्मियों ने स्टोन क्रशर्स को लेकर मुख्यमंत्री पर सवाल दागा तो उन्होंने यह तर्क देकर बचाव किया था कि सब भाजपा की करतूत है।