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वन विभाग के पिंजरे पहचान गए गुलदार

Fri, 21 Aug 2015 03:37 PM IST
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून Updated Fri, 21 Aug 2015 03:37 PM IST
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guldar identify cage of forest department.

वन्य जीवों में सबसे शातिर हमलावर माने जाने वाले गुलदार अब वन विभाग के पिंजरों को पहचान गए हैं।

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शायद इसी लिए बकरा या कुत्ता रखकर लगाए गए पिजरों के आसपास गुलदार फटक तक नहीं रहे हैं। ऐसे में विभाग की चिंता के साथ-साथ उस पर वित्तीय भार भी बढ़ता जा रहा है।

बढ़ते मानव और वन्य जीव संघर्ष से विभाग के आला अधिकारी चिंतित हैं। देहरादून, चमोली, उत्तरकाशी समेत आधा दर्जन जिलों में गुलदार पकड़ने के लिए लगाए गए दर्जनभर पिंजरे खाली पड़े हैं। यह समझ नहीं आ रहा कि अब कौनसी रणनीति बनाई जाए।
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प्रमुख वन संरक्षक चंदोला भी मानते हैं कि विभाग गुलदार पकड़ने की कोई दूसरी रणनीति नहीं बना पाया है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि चूंकि आबादी जंगल के अंदर तक घुसती जा रही है, ऐसे में वन्य जीवों के हमले तेज हुए हैं। एक तरीका यही बचा है कि गुलदार देखकर शोर मचा दें और विभाग को सूचित कर दें।
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गुलदार बढ़ा रहे वित्तीय भार
प्रमुख वन संरक्षक उत्तराखंड एसके चंदोला का कहना है कि पिंजरा लगाने में काफी खर्च आता है। मुख्य खर्च तो उसे ऊंचे पर्वतीय स्थानों पर पहुंचाने का होता है। इसके अलावा पिंजरे में जानवर भी रखना पड़ता है।


जहां एक पिंजरा लगाने में विभाग को हजारों रुपए खर्च करने पड़ते हैं वहीं गुलदार के हमले में मारे गए, अपंग और घायलों को हर साल विभाग लाखों रुपये मुआवजा दे रहा है। बता दें कि गुलदार के हमले में वर्ष 2014 में 14 लोग मारे गए जबकि 23 घायल हुए। वहीं वर्ष 2015 (जून तक) में 15 लोग मरे और 9 घायल हुए।

गुलदार के हमले पर मुआवजा

मृत्यु होने पर - तीन लाख रुपए
अपंग होने पर - दो लाख रुपए
आंशिक अपंगता पर - एक लाख रुपए
गंभीर घायल होने पर - 50 हजार रुपए
साधारण घायल होने पर - 15 हजार रुपए

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