खच्चरों पर लदकर आती है वोट ‘कब्जाने’ वाली मशीन
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खजुरानी गांव की गिनती उत्तराखंड की द्वाराहाट विधानसभा क्षेत्र के उन गांवों में होती है, जहां लोकतंत्र, आजादी के मायने शून्य हैं। वहां जब पहुंचे तब तक हमें ऐसा नहीं लगा कि यहां के लोग 21वीं सदी में जी रहे हैं।
दो सौ साल पहले के गांवों के बारे में जैसा सुना था, वैसी ही एक आदिम दुनिया से यहां साक्षात्कार हुआ। जंगलों, चट्टानों को पार करते हुए खुद यह तय करना पड़ा कि यहीं कहीं आसपास गांव होगा।
बिमोली गधेरे के किनारे से होते हुए करीब 21 किलोमीटर की पैदल दूरी तय कर लेने के बाद आजादी से अनजान लोगों की धरती मिली।
खच्चर पर आती है ईवीएम मशीन
खजूर के एक बड़े वृक्ष के नाम पर इस गांव का नाम खजुरानी पड़ा। 500 वोट लेने वाले यहां से ईवीएम को लाने-ले जाने के लिए भाड़े के खच्चर लाते हैं।
प्राथमिक विद्यालय खजुरानी में मतदान केंद्र है, लेकिन यहां किसी तरह की हलचल नहीं थी। लोकसभा चुनाव में दल कौन, उम्मीदवार कौन इसका कोई अता-पता नहीं।
यह द्वाराहाट विधानसभा क्षेत्र का अंतिम मतदान केंद्र है। जहां 500 वोटर वोट डाल सकेंगे। कुल आबादी 1500 है, जबकि काफी लोग पलायन कर गए हैं।
बरसात में गांव का संपर्क पूरी तरह से टूट जाता है। गांव तक जाने के लिए 10 किमी का रास्ता काफी खतरनाक है। थोड़ी-सी चूक मौत के मुंह में धकेल सकती है।
गांधी बंदूक लेकर मुस्तैद रहते हैं मान सिंह
जंगली जानवरों को भगाने के लिए बुजुर्गवार मान सिंह मेहता हाथ में गांधी बंदूक लिए मुस्तैद रहते हैं। बताते हैं जंगली जानवरों ने गांव का बेड़ागर्क कर रखा है।
ऊबड़ खाबड़ तंग रास्तों और घने जंगल को पार कर ढाई किलोमीटर चलने के बाद तुस्यारी बगड़ खजुरानी का रेस्ट प्वाइंट है। इस प्वाइंट पर शराब के कुछ खाली अध्धे-पव्वे पड़े मिलते हैं।
रास्तों की हालत ऐसी कि पहचान भी न हो पाए। कुछ स्थानों पर छोटे पेड़ों और झाड़ियों का सहारा लेना पड़ता है। फिर दो किमी की खड़ी चढ़ाई चढ़ने के बाद दुर्गम लोकतंत्र यानी खजुरानी के दर्शन होते हैं।
बल्ली के सहारे पार करते हैं नदी
मल्ली गजार और चनौला के गधेरे में बनी पुलिया पिछले साल की आपदा में बह गई थी, लेकिन इसे दोबारा बनाने का काम आज तक शुरू नहीं हो सका है।
इससे परेशान लोग बल्लियों के सहारे नदी पार कर रहे हैं। मल्ला गजार में दो पन चक्कियां थीं जो बीते दिनों की आपदा में बह गई हैं। गांव के लोगों को गेहूं पिसाने तीन किलोमीटर दूर पाखाखरक या फिर पांच किलोमीटर दूर तल्ला गजार जाना पड़ता है।
कालापानी हो गया गांव
खजुरानी के लोगों की आजीविका का साधन कृषि, पशुपालन है। रसोई गैस की ढुलाई की समस्या के चलते लोग लकड़ी जलाकर खाना बनाते हैं। प्रधान नरेंद्र सिंह बताते हैं कि सड़क के अभाव में खजुरानी गांव लोगों के लिए कालापानी जैसा हो गया है।
गांव में आते हैं दो अखबार
खीड़ा के शोबन सिंह खजुरानी में दो अमर उजाला अखबार भेजते हैं। एक गांव के हाईस्कूल में और दूसरा रमेश सिंह के घर जाता है। रमेश सिंह बताते हैं कि कई बार तो दो दिन बाद अखबार पहुंचता है।
बच्चे नहीं जानते सीएम
प्राथमिक विद्यालय खजुरानी में स्थित ब्लैक बोर्ड में पिछले दो साल से कुछ लिखा ही नहीं गया है।
पूछने पर शिक्षा मित्र भगवती बिष्ट ने बताया कि ब्लैक बोर्ड में काला पेंट ठीक से नहीं लगा है जिससे उस पर लिखना संभव नहीं हो पा रहा है। स्कूल के बच्चों को ब्लॉक, तहसील, देश, पीएम और सीएम आदि की कोई जानकारी नहीं थी।
'बस एक बार गाड़ी से आने की इच्छा है'
गांव में सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान से मिलने वाले राशन के दोगुने से भी अधिक रेट हैं। दुकानदार हरीश सिंह ने खुद यह बताया कि वह बीपीएल का गेहूं दो के स्थान पर पांच रुपए, चावल तीन की जगह छह रुपए किलो के हिसाब से बेचने को मजबूर हैं।
उनका कहना है कि उन्हें चौखुटिया से खजुरानी तक का सरकारी भाड़ा 213 रुपए मिलता है, जबकि खीड़ा से खजुरानी का एक क्विंटल का खच्चर भाड़ा ही 500 रुपए है। खीड़ा से खजुरानी के बीच कहीं भी मोबाइल नेटवर्क काम नहीं करता है।
गांव के 74 वर्षीय प्रवीन सिंह रौतेला कहते हैं कि वे नहीं जानते कि सरकार क्या होती है और इसे चलाता कौन है। 80 वर्षीय धनुली देवी कहती हैं कि उनकी गांव तक गाड़ी से आने की इच्छा है, देखो इस जीवन में पूरी होती है कि नहीं।