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फौजियों के कल्याण का निदेशालय 'खाली'
देहरादून/अरुणेश
Updated Sun, 18 Aug 2013 07:33 PM IST
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उत्तराखंड सरकार के फौजियों के कल्याण के दावे तो बड़े हैं, लेकिन ढ़ाई वर्ष से रिक्त पड़े सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास निदेशक पद पर तैनाती अटकी पड़ी है।
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राज्य में दस लाख की आबादी पूर्व सैनिक व उनके आश्रितों की है, ऐसे में सरकार उनके कल्याण के लिए गठित निदेशालय को सुचारु चलाने में असमर्थ दिख रही है।
जारी नहीं हुआ शासनादेश
यह पहली बार नहीं है जब निदेशक पद पर तैनाती के शासनादेश जारी नहीं किया जा रहा। वर्ष 2012 में भी रिटायर ब्रिगेडियरों को इंटरव्यू के लिए बुलाने के बाद शासन ने चयन प्रक्रिया खारिज कर दी थी।
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पूर्व सैनिकों के कल्याण को लेकर प्रदेश के राज्यपाल 15 अगस्त को अपनी मुख्यमंत्री से जता चुके हैं, लेकिन राज्य सरकार पूरी तरह से आंखे मूंदे बैठी है।
बिना निदेशक के निदेशालय
पूर्व सैनिकों के लिए कल्याणकारी योजनाएं बनाने और पुनर्वास को लेकर गठित निदेशालय ढ़ाई वर्ष से बिना निदेशक के चल रहा है।
सैन्य बाहुल्य प्रदेश होने के बावजूद निदेशक की तैनाती पर जमकर राजनीति हो रही है। 16 मई को 6 रिटायर ब्रिगेडियरों के पैनल का साक्षात्कार करवा अगस्त में मेरिट लिस्ट तक बनाई गई, लेकिन अब शासनादेश जारी नहीं किया जा रहा है।
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मंत्री नहीं है खुश
सूत्रों की माने तो विभागीय मंत्री हरक सिंह रावत मैरिट लिस्ट के नतीजों से संतुष्ट नहीं हैं। ऐसे में शासन तैनाती आदेश जारी करने को लेकर असमर्थता जता है। मामला मुख्य सचिव तक पहुंचा है, लेकिन अभी तक कोई फैसला नहीं हुआ।
न निदेशक न जिलों में अधिकारी
सैनिक कल्याण निदेशालय की कार्यप्रणाली निदेशक की स्थाई तैनाती न होने के चलते प्रभावित हो रही है। कार्यवाहक निदेशक के तौर पर तैनात अधिकारी के पास दोहरा चार्ज है, जबकि आधा दर्जन से अधिक जिला सैनिक कल्याण अधिकारियों के पद खाली पड़े हैं।