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आजादी के दीवानों का ऐसा हश्र ...
आफताब अजमत
Updated Mon, 12 Aug 2013 08:33 PM IST
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स्वतंत्रता आंदोलन में जान की बाजी तक लगा देने वाले उत्तराखंड के लोगों को सम्मान की खातिर उम्र के आखिरी पड़ाव पर भी जंग जारी रखनी पड़ रही है। प्रशासन से जारी तमाम प्रमाणपत्रों के बावजूद सरकार उन्हें स्वतंत्रता सेनानी नहीं मान रही, शायद इसीलिए उन्हें पेंशन नहीं दी जा रही।
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‘दिलाकर रहूंगी पति को सम्मान’
स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय लच्छीराम जोशी की पत्नी 84 वर्षीय मगन देवी कैंसर पीड़ित हैं और घर में बिस्तर पर लेटी थीं। मगन एक साल से इस बीमारी की वजह से भले अब उठ तक न पाती हों, लेकिन इससे पहले 35 साल से वह सो चुके सिस्टम को जगाने के लिए अनवरत जूझती रहीं। उनकी लड़ाई है पति को सरकार से सम्मान और पेंशन दिलाने की। वह कुछ बोल तो नहीं सकीं, लेकिन हाव-भाव और आंखों की चमक से जैसे कहा कि ‘पति को सम्मान दिलाकर रहूंगी।’
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घर में मगन के बेटे सीपीडब्लूडी से रिटायर्ड रमेश चंद्र जोशी और सेना से सेवानिवृत्त अरविंद कुमार जोशी रू-ब-रू हुए। बातचीत का सिलसिला बढ़ा तो जो बातें सामने आईं, उन्हें सुनकर यही सवाल कौंधा कि ‘क्या यही आजादी के दीवानों का हश्र है?’ रमेश और अरविंद ने बताया कि उनके पिता लच्छीराम जोशी पंडित जवाहर लाल नेहरू संग भारत छोड़ो आंदोलन में कूदे। 21 जुलाई 1941 से 27 जुलाई 1941 तक वह जेल में रहे। 15 अगस्त 1972 को दून के तत्कालीन जिलाधिकारी रमेश चंद्र त्रिपाठी ने उन्हें अभिनंदन पत्र दिया।
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अपनी जंग शुरू की
रमेश ने बतौर प्रमाण यह अभिनंदन पत्र और जिला कारागार वह प्रमाणपत्र भी सामने रख दिया, जिसमें उनके पिता के जेल में रहने की अवधि और उन पर लगी कानूनी धाराओं का उल्लेख था। 23 जनवरी 1971 को जोशी का निधन हो गया। 1975 में ‘स्वतंत्रता सेनानी नियमावली’ आई तो उनकी पत्नी मगन देवी को भी पेंशन की उम्मीद जगी।
किसी ने सुध नहीं ली तो 1977 में उन्होंने अपनी जंग शुरू की। अफसरों के चक्कर काटे, उत्तराखंड बना तो लगा अब सुनवाई होगी। यहां भी एक के बाद एक सरकारें बदलती गईं, लेकिन मगन देवी के चक्कर काटने का सिलसिला बंद नहीं हुआ।
रमेश ने बताया कि लंबी भागदौड़ के बाद प्रशासन और जेल अधिकारियों ने लच्छीराम जोशी के स्वतंत्रता सेनानी होने पर मुहर लगाई। यहां से आवेदन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के पास पहुंचा, लेकिन 31 जुलाई 2012 को सीएम ने मगन के आवेदन पर ‘रिजेक्टेड’ लिख दिया। इस बीच कैंसर का रोग मगन देवी के शरीर में घर कर चुका था। डाक्टर ने आखिरी स्टेज बताई तो मां को घर से निकलने से रोक दिया।
हालांकि, मगन की आस टूटी नहीं है। रमेश और अरविंद की कोशिशों पर पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने सीएम विजय बहुगुणा को पत्र भेजा, लेकिन सरकार नींद से जागी नहीं है। अब तक यह भी साफ नहीं किया गया है कि मगन देवी का आवेदन निरस्त क्यों किया गया। बातचीत अब खत्म हो गई थी। कुछ पल चुप रहकर रमेश चंद्र जोशी ने एक नजर बिस्तर पर पड़ी मां को देखा, फिर हमारी ओर मुड़कर बोले ‘भले ही सरकार खामोश हो, लेकिन सच कभी छिपता नहीं है। एक दिन मां को सम्मान जरूर मिलेगा।’
42 दिन की जेल, 28 साल का इंतजार
सत्येश्वर शर्मा ने कभी देश की आजादी का सपना देखा था। अंग्रेजों के खिलाफ झंडा बुलंद किया और इसकी सजा 42 दिन जेल के रूप में भुगती। डीएवी कालेज से नौ महीने तक निष्कासित रहे। लेकिन आजादी का यह जुनून सत्ता की कमान अपनों के हाथ में आने के साथ ही काफूर हो गया। साल दर साल बीतते गए, लेकिन शर्मा स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा हासिल नहीं कर सके। 28 साल से उनकी फाइल इधर से उधर भटक रही है।
उम्र के आखिरी पड़ाव पर उन्हें आजादी की लड़ाई में योगदान पर गर्व तो है, लेकिन सरकारी बेरुखी का दर्द कचोट रहा है। त्यागी रोड निवासी सत्येश्वर शर्मा दो सितंबर 1942 से 19 अक्टूबर 1942 तक जेल में रहे। 15 अगस्त 1972 को डीएम रमेशचंद्र त्रिपाठी ने उनका अभिनंदन कर सम्मान पत्र भेंट किया था। वर्ष 1985 में शर्मा ने स्वतंत्रता सेनानी के लिए आवेदन किया, लेकिन फाइल अटकी रही।
कई बार अफसरों के चक्कर काटे
सत्येश्वर शर्मा के आवेदन को नियमों के तहत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बुद्धिप्रकाश फरासी और धर्मस्वरूप रतूड़ी ने प्रमाणित भी किया था। कई बार अफसरों के चक्कर काटे। अब बीते साल शासन तक किसी तरह फाइल पहुंची, लेकिन 20 फरवरी 2013 को आवेदन इस टिप्पणी के साथ लौट आया कि इस पर डीएम की संस्तुति नहीं है। अब चार महीने बाद भी जिलाधिकारी के स्तर से शर्मा की फाइल संस्तुति के साथ शासन को नहीं भेजी जा सकी है। बातचीत करते हुए रूंधे गले से सत्येश्वर कहते हैं, ‘कभी सोचा नहीं था, आजादी के बाद ऐसे दिन देखने होंगे।’
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