कुछ ऐसे हैं उत्तराखंड में अफसरशाही के कारनामे
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कहने को उत्तराखंड की कमान अफसरों के हाथ में है, लेकिन अफसरशाही के यह कारनामे कुछ और ही बयां कर रहे हैं।
देहरादून में अवैध कब्जों को लेकर आवास मंत्री जी थोड़ा संवेदनशील हुए तो उनका विभाग भी हरकत में आया। अब मंत्री ने आदेश किए हैं तो कुछ करना है सो कर रहे हैं।
अवैध कब्जों का मामला देख रहे जिम्मेदार अफसर को यह सब मजाक लग रहा है। साथी अफसरों से बोले-भाई कब्जे तो होते रहेंगे।
अभियान भी साथ ही में चलता रहेगा। हां, एक स्थिति ऐसी आएगी कि अवैध कब्जों वाला झंझट ही खत्म हो जाएगा।
अफसरों ने सुना तो गंभीर हो गए कि साहब के पास जरूर कोई ऐसा चूरन है जो अवैध कब्जों वाली गैस से निजात दिला सकता।
कुछ देर खामोशी रही, फिर एक अफसर बोले-साहब कैसे? अरे कैसे क्या, जब सारी जमीन पर कब्जा हो जाएगा तो फिर कब्जा करने के लिए बचेगा ही क्या? झंझट खत्म। जब तक पूरी जमीन पर अवैध कब्जे नहीं होते यह सिलसिला चलता रहेगा।
बुद्धिमान होना भी मूर्खता है
‘जहां मूर्खता बुद्धिमत्ता हो वहां बुद्धिमान होना मूर्खता है’-अंग्रेजी कविता एलजी रिटन इन कंट्री चर्चयार्ड की यह लाइन एक अफसर ने उनके चैंबर में घुसते ही मुझे सुनाई।
फिर बोले-‘आइये बैठिये। सोचते हैं कि कहीं और ट्रांसफर करा लें। यहां देहरादून में....कुछ ज्यादा ही है।’ ‘हुआ क्या?’ ‘अरे होना क्या है? सब...हैं।’ कुछ देर बात हुई तो पता चला कि वह हाकिम पर बिफरे हुए थे।
दरअसल यह साहब नियम-कायदे से चलने वाले कीड़े हैं। हाकिम ने उन्हें शासन से पड़े प्रेशर के कारण एक छुटभैया नेता का गलत काम तुरंत करने के लिए कहा था।
जब इन साहब ने नियमावली हाकिम के सामने रखकर कहा कि ‘यह काम नहीं हो सकता’ तो हाकिम झल्ला गए बोले-‘तुम नहीं तो और कोई करेगा।’ इसके बाद शाम को उस पद से उनके ट्रांसफर का आदेश हो गया।
बहुत दिनों से इस पद के लिए ताक में बैठे जो दूसरे साहब आए उन्होंने ज्वाइन करने के बाद पहला दस्तखत उस फाइल पर किया था। कुछ देर खामोशी के बाद मुझे यह बात बताकर बोले-‘यह...का पेशा हो गया है।’
कर्मचारी बने चक्करघिरनी
उत्तराखंड में खाद्य सुरक्षा बिल योजना जुलाई महीने में शुरू होनी है, लेकिन 15 जून तक कार्ड बांटने और कार्ड बनाने के चक्कर में कर्मचारी ही चक्करघिरनी बनने लगे हैं।
पूर्व में सत्यापित किए कई कार्ड मालिकों की मृत्यु हो गई है, तो कई इलाकों में एक ही परिवार के अलग-अलग कार्ड बन गए हैं। वहीं अब लोग सफेद के साथ ही पीले कार्ड भी मांग रहे हैं।
डीएसओ कार्यालय के एक कमरे में बैठे एक दुकानदार ने दूसरे से बोला भाई आजकर दिमाग खराब हो गया है। सफेद कार्ड दे दिए हैं, तब भी पीले कार्ड मांग रहे हैं।
एक महिला से पूछा तो बोली दोनों में ही राशन ले लेंगे तो क्या बिगड़ जाएगा। कार्ड तो हमारे ही हैं। इस बात पर दूसरे ने कहा भाई जी ये तुम्हारी ही नहीं मेरी भी मुसीबत है।
साहब का गिरगिट रंग
साहब, पूरे रौब के साथ फाइलों को निपटा रहे थे। तभी दो व्यक्ति आए और साहब से नए खरीदे वाहन के लिए वीआईपी नंबर देने की रिक्वेस्ट की। साहब को गुस्सा आ गया। ताव से बोले, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई।
क्या तुम कोई वीआईपी हो। यह सुनकर वह व्यक्ति बाहर चला गया। पास में ही बाबू खड़ा था। साहब ने फिर से ताव से बाबू की तरफ देखा और बोले कि कैसे अंदर घुसने देते हो, ऐसे लोगों को।
बाबू बोले कि साहब मैं क्या करता, उस व्यक्ति ने बोला कि वह सीएम कार्यालय से आया है। यह सुनकर साहब के होश उड़ गए। तुरंत सीट से उठे और बाहर भागे।
थोड़ी देर में वह व्यक्ति उनके साथ चाय पी रहा था और साहब चपरासी पर चिल्ला रहे थे कि वह अच्छे वाले बिस्कुट क्यों लेकर नहीं आया। साहब के गिरगिट की तरह रंग बदलते देख सभी हैरान थे।
खूब ‘पावर’ दिखा रहे हैं साहब
जनता को चौबीस घंटे ‘पावर’ देने का दावा करने वाले महकमे के एक अफसर की ‘पावर’ इन दिनों कर्मचारियों से लेकर सत्ता के गलियारों तक चर्चा में है।
उत्तराखंउ की जनता को 24 घंटे की पावर देने में भले ये साहब आंकड़ेबाजी के खेल तक ही सिमटे हों। लेकिन खुद को पावर में रखने के लिए ये अपनी पावर का खूब बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं।
तभी तो पेंशन की बात छुपाने से लेकर कुछ खास दरबारी अफसरों को संरक्षण देने, विरोधी गुट के अफसरों, कर्मचारी नेताओं की मुखबिरी कर उन पर दबाव बनाने और इतना ही नहीं पूर्व के विभाग से निलंबित होने के बावजूद पांच-पांच अहम पदों पर खुद का कब्जा करने में अपनी पावर दिखा रहे हैं।
कर्मचारियों और अफसरों में आजकल इन ‘पावरमैन’ साहब की कारगुजारियों के चर्चे खूब हो रहे हैं।
ये कर्मचारी अक्सर यही कहते सुनाई देते हैं कि न जाने प्रदेश की पावर के केंद्र माने जाने वाले और आम जनता से जुड़ा होने का दावा करने वाले नेताजी कब इन साहब को पावर का सही इस्तेमाल करने का सबक सिखाएंगे।
वरना दाग से उनका दामन भी अछूता नहीं रह पाएगा।
नौकरी भले ही जाए, जेल नहीं जाएंगे
देश के अन्य राज्यों की तरह उत्तराखंड में अनुशासित माने जाने वाली खाकी के बगावती तेवर इन दिनों अधिकारियों को पसीने दिलाने वाले हैं।
हो भी क्यों ना, उनके साथियों को अफसरों के आदेश के नाम पर बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। एक नहीं ऐसे कई उदाहरण है, जिन्हें मुद्दा बनाकर एक बडा वर्ग गाहे-बगाहे यह कहने में नहीं चूक रहा है कि जेल नहीं जाएंगे, चाहे नौकरी चली जाए।
रणवीर एनकाउंटर में अधिकारियों के बचने और निचले पुलिसकर्मियों की सजा के बाद यह आवाज बुलंद होती दिख रही है। खुले तौर परिजन अधिकारियों को कटघरे में खड़ा कर चुके है।
अधिकारी भी बदल रही नई सोच से छटपटाहट में हैं। एक आला अफसर से वर्दीधारी का टकराव भी इसी सोच का नतीजा है। एक लफडे में मनमाफिक काम न करने पर वर्दीधारी को यह पटकनी दी गई है।
बावजूद इसके वह बड़ी हिम्मत से हर कार्रवाई को सहन कर उसी अंदाज में जवाब भी दे रहा है। अंदरुनी तौर पर व्यापक स्तर पर मिले विभागीय समर्थन ने अफसर के पसीने छुडा रखे है।
एक मातहत आला अफसर की कुर्सी खिसकाने का कारण न बन जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता है, क्योंकि विभाग से लेकर सरकार तक को यह फजीहत झेलनी पड़ रही है।
जाहिर है कि यदि यह सोच बढ़ी तो अनुशासन के नाम पर अधिकारियों द्वारा निचले कर्मचारियों से कराए जाने वाले काले-पीले काम के दिन अब लदने वाले हैं।