{"_id":"59ae232e4f1c1ba1078b4585","slug":"glaciers-are-increasing","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"बढ़ रही है ग्लेशियरों की लंबाई, इसके पीछे है ये राज","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बढ़ रही है ग्लेशियरों की लंबाई, इसके पीछे है ये राज
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Thu, 07 Sep 2017 08:35 AM IST
विज्ञापन
श्चिमी विक्षोभ ने उत्तरी-पश्चिमी हिमालय और कराकोरम क्षेत्र में ग्लेशियर नहीं सिकुड़े
- फोटो : Getty Images
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
ग्लोबल वार्मिंग के कारण जब मध्य-पूर्वी हिमालय समेत दुनिया भर में ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं तब पश्चिमी विक्षोभ ने उत्तरी-पश्चिमी हिमालय और कराकोरम क्षेत्र में इस प्रक्रिया को उलट दिया है।
पश्चिमी विक्षोभ से इस क्षेत्र के ग्लेशियरों की लंबाई बढ़ रही है। यह राज चिलगोजा और हिमालयी देवदार की रिंग की जांच के बाद उजागर हुआ है। विज्ञानियों ने यहां पहली बार पेड़ों की रिंग की जांच करके 576 साल की स्थिति का अध्ययन किया है।
उत्तरी-पश्चिमी हिमालय क्षेत्र किश्तवाड़, जम्मू-कश्मीर और कराकोरम क्षेत्र में ग्लोबल वार्मिंग के बावजूद ग्लेशियरों की लंबाई बढ़ने और कुछ ग्लेशियरों के स्थिर रहने का खुलासा वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के विज्ञानियों के ताजा शोध में हुआ है। इस रिपोर्ट को लंदन (ब्रिटेन) के नेचर ग्रुप के जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट में प्रकाशित किया गया है। विज्ञानियों ने यहां चिलगोजा और हिमालयी देवदार के वृक्षों की रिंग का अध्ययन किया तो राज की परतें खुलती चली गईं।
विज्ञापन
विज्ञापन
पश्चिमी विक्षोभ से इस क्षेत्र के ग्लेशियरों की लंबाई बढ़ रही है। यह राज चिलगोजा और हिमालयी देवदार की रिंग की जांच के बाद उजागर हुआ है। विज्ञानियों ने यहां पहली बार पेड़ों की रिंग की जांच करके 576 साल की स्थिति का अध्ययन किया है।
विज्ञापन
उत्तरी-पश्चिमी हिमालय क्षेत्र किश्तवाड़, जम्मू-कश्मीर और कराकोरम क्षेत्र में ग्लोबल वार्मिंग के बावजूद ग्लेशियरों की लंबाई बढ़ने और कुछ ग्लेशियरों के स्थिर रहने का खुलासा वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के विज्ञानियों के ताजा शोध में हुआ है। इस रिपोर्ट को लंदन (ब्रिटेन) के नेचर ग्रुप के जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट में प्रकाशित किया गया है। विज्ञानियों ने यहां चिलगोजा और हिमालयी देवदार के वृक्षों की रिंग का अध्ययन किया तो राज की परतें खुलती चली गईं।
विज्ञापन
सर्दियों और बसंत ऋतु के दौरान अच्छी बारिश होती है
पश्चिमी विक्षोभ की वजह से अच्छी बारिश हुई
शोध में पाया कि पश्चिमी विक्षोभ की वजह से क्षेत्र में सर्दियों और बसंत ऋतु के दौरान अच्छी बारिश होती है। इससे यहां वातावरण में अच्छी-खासी नमी रहती है जो उत्तरी-पश्चिमी हिमालय और कराकोरम के ग्लेशियरों को सहेजे हुए है। पश्चिमी विक्षोभ भूमध्य सागर से यहां आता है।
पूर्वी हिमालय की तरफ जाते-जाते पश्चिमी विक्षोभ की तीव्रता कम हो जाती है। विज्ञानियों ने पेड़ों की रिंग के जरिये यहां वर्ष 1439 से वर्ष 2014 तक 576 वर्ष का अध्ययन किया। इसमें पाया गया कि वर्ष 1984 से वर्ष 2014 तक, 31 साल के अरसे में पश्चिमी विक्षोभ के कारण सबसे अधिक बारिश हुई है।
वृक्षों की रिंग बता देती है बारिश
उत्तरी पश्चिमी हिमालय और कराकोरम में शोध वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. आरआर यादव, पूर्व निदेशक डॉ. एके गुप्ता की अगुवाई में किया गया। उनका कहना है कि पश्चिमी विक्षोभ से इस क्षेत्र में अधिक बारिश होती है। 20वीं और 21 वीं सदी में यहां अधिक बारिश हुई है। पेड़ की रिंग से बारिश के बारे में पता चल जाता है। अगर बारिश नहीं होगी तो रिंग गायब हो जाएगी। पेड़ों में रिंग हर साल बनती है। इसके लिए क्षेत्र के सभी वृक्षों से सैंपल लिए जाते हैं।
पूर्वी हिमालय की तरफ जाते-जाते पश्चिमी विक्षोभ की तीव्रता कम हो जाती है। विज्ञानियों ने पेड़ों की रिंग के जरिये यहां वर्ष 1439 से वर्ष 2014 तक 576 वर्ष का अध्ययन किया। इसमें पाया गया कि वर्ष 1984 से वर्ष 2014 तक, 31 साल के अरसे में पश्चिमी विक्षोभ के कारण सबसे अधिक बारिश हुई है।
वृक्षों की रिंग बता देती है बारिश
उत्तरी पश्चिमी हिमालय और कराकोरम में शोध वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. आरआर यादव, पूर्व निदेशक डॉ. एके गुप्ता की अगुवाई में किया गया। उनका कहना है कि पश्चिमी विक्षोभ से इस क्षेत्र में अधिक बारिश होती है। 20वीं और 21 वीं सदी में यहां अधिक बारिश हुई है। पेड़ की रिंग से बारिश के बारे में पता चल जाता है। अगर बारिश नहीं होगी तो रिंग गायब हो जाएगी। पेड़ों में रिंग हर साल बनती है। इसके लिए क्षेत्र के सभी वृक्षों से सैंपल लिए जाते हैं।