Dehradun: दून में बढ़ते जा रहे कूड़े के पहाड़, रैंकिंग ही नहीं, प्रकृति और पर्यटन को भी पहुंचा रहा नुकसान
यहां घर-घर से कूड़ा उठाने, जगह-जगह कूड़ेदान रखने और कूड़े को ट्रंचिंग ग्राउंड में पहुंचाने का काम तो किया जा रहा है, लेकिन इसकी रफ्तार इतनी धीमी है कि इसका असर नहीं दिख रहा है।
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वन क्षेत्र और प्राकृतिक जलस्रोतों वाला देहरादून भी अगर स्वच्छता के पैमाने पर खरा न उतर पाए तो यह चिंता सिर्फ रैंकिंग तक सीमित नहीं रह जाती। दून का सफाई में पिछड़ना प्रकृति और पर्यटन के लिहाज से भी बेहद नुकसानदायक है।
दून में पसरी गंदगी सीधे तौर पर नदियों, जंगल और इको सेंसिटिव जोन को प्रभावित करती है। यहां घर-घर से कूड़ा उठाने, जगह-जगह कूड़ेदान रखने और कूड़े को ट्रंचिंग ग्राउंड में पहुंचाने का काम तो किया जा रहा है, लेकिन इसकी रफ्तार इतनी धीमी है कि इसका असर नहीं दिख रहा है।
वहीं, समय पर कचरे का प्रबंधन भी नहीं किया जा रहा। घरों से कूड़ा उठान भी दो से तीन दिन में एक बार होता है। जगह-जगह रखे गए कूड़ेदान भी जब तक ऊपर तक भर नहीं जाते और कूड़ा बिखरने नहीं लगता, तब तक वह खाली नहीं किए जाते हैं।
वहीं, नदियों में फैला कूड़ा भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। इसके निस्तारण के लिए हाईकोर्ट भी कई बार निर्देश दे चुका है, इसके बावजूद जगह-जगह नदियों में कूड़ा फैला नजर आता है। समय से निस्तारण नहीं हो पाने से कूड़े के पहाड़ बनते जा रहे हैं।
आसानी से निस्तारित होने वाले कूड़े के भी लगाए जा रहे ढेर
शहर की मंडियों से रोजाना 15 मीट्रिक टन कूड़ा एकत्रित होता है। यह कूड़ा आसानी से निस्तारित किया जा सकता है, लेकिन यह भी नहीं हो पा रहा है। यह पूरा कूड़ा ट्रंचिंग ग्राउंड में डाला जा रहा है। इससे कूड़े के पहाड़ खड़े हो रहे हैं।
डेढ़ करोड़ का संयंत्र हो गया बेकार
शहर की सब्जी मंडियों का कूड़ा निस्तारित करने के लिए निरंजनपुर मंडी में डेढ़ करोड़ रुपये खर्च कर संयंत्र लगाया गया था, लेकिन इसे चलाया नहीं जा सका। इस कारण मंडियों में कचरा अटा पड़ा है। कूड़ा निस्तारण के लिए लगा यह प्लांट चलता तो रोजाना 10 मीट्रिक टन कचरे का निस्तारण हो सकता था। इससे बनने वाली जैविक खाद भी खेती के लिए बेहद मुफीद थी।
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ठोस कचरा प्रबंधन पर नहीं ध्यान
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट बताती है कि ठोस कचरा प्रबंधन के मामले में उत्तराखंड देश के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक है। देहरादून का भी हाल यही है। यहां ठोस कचरा प्रबंधन को लेकर कोई बड़ा काम नहीं हो रहा है। अब भी घर-घर कचरा उठाने का कार्य सही तरीके से नहीं किया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन हो रहा है। इससे देहरादून पर भी दबाव बढ़ गया है। देहरादून नगर निगम में ही वार्डों की संख्या 60 से बढ़कर 100 हो गई। स्वच्छता को लेकर आम लोग जिम्मेदारी नहीं समझ रहे हैं। इसका नतीजा लगातार बढ़ते कूड़े के पहाड़ हैं।
स्वच्छता के लिए आम लोगों को जागरूक होना होगा, खुद अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी, जब तक शहरी लोग आगे नहीं आएंगे कोई संस्था शहर को अकेले साफ नहीं कर सकती। - सविता कपूर, विधायक