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गंगा उद्गगम की कहानी, बाबा रामदेव की जुबानी

Fri, 25 Jul 2014 04:55 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
अमर उजाला, देहरादून Updated Fri, 25 Jul 2014 04:55 PM IST
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gangotri condition by baba ramdev

हिमालय की तबाही और गंगा के क्षोभ से हुए विनाश के साल भर बाद बाबा रामदेव उस क्षेत्र को देखने पहुंचे। वहां से लौटकर क्या है बाबा की व्यथा और दृष्टि, उन्हीं के शब्दों में...

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बाबा रामदेव कहते हैं कि लगभग इक्कीस वर्ष बाद गंगा के किनारे-किनारे उद्गम स्थल गया तो बहुत कष्ट हुआ। गौमुख ही नहीं इस क्षेत्र का हिमालय भी उजड़ा हुआ दिखाई दे रहा है। इन वर्षों में बहुत कुछ बदल गया है। वनों और गंगा ही नहीं, गंगा पुत्रों की पूरी कथा बदल चुकी है।
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करीब दो दशक पहले संन्यास दीक्षा ली थी। उससे पहले हिमालय में लगातार तप किया। साधना का वह दौर उत्तरकाशी से गौमुख के बीच बीता।

एकांत साधना करते हुए प्रकृति की गोद में बैठकर हिमालय की छटा को निहारना बहुत अच्छा लगता था। हाल ही में गौमुख गया तो पूरा क्षेत्र उजड़ा-उजड़ा दिखाई दिया। बर्बादी का मंजर रास्ते में कईं जगह नजर आया।

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गौमुख से 100 मीटर दूरी पर करते थे साधना

gangotri condition by baba ramdev

गौमुख में जिस गंगा को मात्र 100 मीटर की दूरी से निहारा करता था, वह गौमुख ग्लेशियर के खिसकने से एक हजार मीटर पीछे चला गया। गौमुख से गंगा तो निकल रहीं थी पर गौमुख काफी जीर्ण-शीर्ण दिखाई पड़ रहा था।

कुछ असर ग्लोबल वार्मिंग का है और कुछ अव्यवस्थाओं की देन हैं। पहाड़ टूटे पड़े हैं। वनस्पति बिखर गई है। गंगोत्री में रहने वाले तीर्थ पुरोहितों और साधु-संतों के चेहरों पर उदासी है। भय और खौफ साफ-साफ नजर आते हैं।

जो भूमि ऋषियों की कर्मस्थली थी, तपोभूमि थी, धरती का स्वर्ग थी, वह भूमि कराह रहीं है। अच्छा न लगा, बुरा लगा।

कभी गंगोत्री में ही होता था गौमुख

gangotri condition by baba ramdev
गंगा तो निर्मल है, बह भी रहीं हैं। एक जमाना था जब गौमुख भी गंगोत्री में ही था। इस मार्ग पर भोजपत्रों के जंगल थे। साधु-संत तप करते थे। अब आपदा का भय दिखाकर किसी को जाने नहीं दिया जाता।

उत्तराखंड के दर्शनार्थ आने वाले यात्रियों को भी भय ग्रस्त कर दिया गया है, यह उचित नहीं। कोशिश होनी चाहिए कि पर्यावरण को बचाकर ग्लेशियर का खिसकना रोका जाए।

यह काम विशुद्ध रूप से सक्षम और समर्थ लोगों को करना होगा। उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था ही नहीं वहां के समाज संस्कृति और सभ्यता को बचाए रखने के लिए बहुत कम काम हुआ है।

हमने पतंजलि योगपीठ के माध्यम से जड़ी-बुटियों, आयुर्वेद और औषधियों के क्षेत्र में काम किए हैं। और भी बड़े काम किए जा सकते हैं।

पर्यटन और तीर्थाटन में अंतर होता है

gangotri condition by baba ramdev

पिछले दो वर्षों से भारत स्वाभिमान यात्रा के माध्यम से देशव्यापी जन जागरण किया। उस यात्रा पर आपत्ति हो सकती थी। मुझे समझ नहीं आया कि मेरी गौमुख की अध्यात्मिक यात्रा पर क्यों आपत्ति की गई।

मेरे साथ उच्च शिक्षित युवाओं का दल था। ये युवा प्रकृति को समझने आए थे। अफसोस कि उन पर भी सवाल खड़े कर दिए गए।

चिंतन-मनन, तप-साधना और अध्यात्मिक यात्रा सत्ता की मोहताज नहीं। पर्यावरण, हिमालय एवं नदियों को बचाने के लिए अध्यात्मिक जगत का सहयोग लेना चाहिए। पर्यटन और तीर्थाटन में क्या अंतर है, यह जानना जरूरी है। उसे बताने वाले लोगों को भी बढ़ावा मिले।

तो अपने उद्गम को लौट रही गंगा?

gangotri condition by baba ramdev

भूगर्भ शास्त्रियों की नवीनतम शोध यह है कि गंगोत्री ग्लेशियर (हिमनद) निरंतर सिकुड़ता जा रहा है। 1995 में वह 22 किमी. लंबा था, अब करीब बीस साल में वह छह किमी. रह गया है। आकलन यह है कि 2022 में वह आधा किमी. भी नहीं रहेगा। सीधे शब्दों में गंगा का जो पतित पावन जल जैसा भी हो, अभी मिल रहा है वह नसीब नहीं होगा।

क्या इन पौराणिक संदर्भों को सही मानें कि स्वर्ग से उतरी गंगा वापस अपने स्थान पर पहुंच रही हैं। किसी जमाने में भगीरथ ने तपस्या कर गंगा को धरती पर उतारा था। अब उसे कायम रखने या उसे वापस लाने  के लिए भगीरथ प्रयत्नों की यह कठोर तप की जरूरत पड़ेगी।

--प्रस्तुति: कौशल सिखौला।

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