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पहाड़ी निवेशकों को नहीं रिझा पाई 'शराब'
अरुणेश पठानिया/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Mon, 09 Dec 2013 01:22 PM IST
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हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर फ्रूट बेस वाइन पॉलिसी लाकर उत्तराखंड सरकार का पहाडों में रोजगार और राजस्व की तस्वीर बदलने का सपना पूरा नहीं हुआ।
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पॉलिसी लागू किए 9 माह बीत गए लेकिन अभी तक एक भी शराब निर्माता कंपनी ने उत्तराखंड का रूख नहीं किया। पहाड़ों में मूल भूत सुविधाओं का कमजोर ढांचा निवेशकों को आकर्षित नहीं कर पा रहा है।
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विशेष छूट व सुविधाएं भी
नीति के तहत पहाड़ में लगने वाले वाइनरी प्लांट को हिल डेवलपमेंट पॉलिसी के तहत विशेष छूट व सुविधाएं भी निवेशकों को नहीं रिझा पा रही हैं।
आबकारी के क्षेत्र में माइक्रो ब्रुवरी व बॉटलिंग प्लांट के लाइसेंस दिए जाने को मंजूरी देने के बाद सरकार ने फरवरी 2013 में पहाड़ में लगाने जाने वाले वाइनरी प्लांट को हिल डेवलपमेंट पॉलिसी के तहत छूट व सुविधाएं देने का फैसला लिया था।
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तैयार किए गए ड्राफ्ट में दो तिहाई हिस्सा हिमाचल वाइन नीति से लिया है। वाइन इंडस्ट्री लगाने वालों के लिए सरकार ने काफी राहत देने का काम भी किया है। लाइसेंस लेने के लिए किए गए आवेदन का शासन को तीस दिन के भीतर निस्तारण करना होगा।
लाइसेंस मिलने के एक वर्ष के भीतर इंडस्ट्री लगानी होगी, लेकिन कोई लाइसेंस लेने आया ही नहीं। अपर सचिव आबकारी विनय शंकर पांडे ने बताया कि लागू वाइन पॉलिसी के तहत अभी किसी भी निवेशक ने लाइसेंस के लिए आवेदन नहीं दिया है।
नहीं बदली पहाड़ों की आर्थिकी
वाइनरी पॉलिसी से पहाड़ के फल उत्पादकों की किस्मत संवरने का ख्वाब भी पूरे नहीं हुए। पहाड़ में विपणन की व्यवस्था नहीं होने के कारण हर साल बर्बाद होने वाली 40 प्रतिशत से ज्यादा फल उत्पाद इससे बच सकता है।
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पहाड़ में वाइनरी यूनिट लगाएगा उसे हिल डेवलपमेंट पालिसी के तहत बिजली, टैक्स, परिवहन आदि में सब्सिडी की सुविधा है। नेशनल फूड मिशन के तहत मिलने वाली सब्सिडी का लाभ भी वाइनरी प्लांट लगाने वाले को मिलेगा।