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मौत से ‘सम्मान’ की लड़ाई हार गए सत्येश्वर, स्वतंत्रता आंदोलन में अंग्रेजों के सामने फहराया था तिरंगा

Wed, 22 Nov 2017 11:15 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून Updated Wed, 22 Nov 2017 11:15 PM IST
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freedom fighter Satyeshwar Sharma pass away in dehradun
Satyeshwar Sharma

1942 के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहकर अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग का बिगुल फूंकने वाले सत्येश्वर शर्मा (100) मौत से सम्मान की लड़ाई हार गए। बुधवार को त्यागी रोड स्थित अपने निवास में उन्होंने अंतिम सांस ली।

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पर्याप्त दस्तावेज और सबूत होने के बावजूद उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सैनानी का दर्जा नहीं मिल पाया था। यह दर्जा पाने के लिए शर्मा और उनके परिजन पिछले करीब 35 वर्षों से नेताओं और अधिकारियों के चक्कर काट रहे थे।
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त्यागी रोड निवासी सत्येश्वर शर्मा ने 1942 के असहयोग आंदोलन के दौरान अंग्रेजी हुकूमत के सामने भारतीय ध्वज फहराने के आरोप में उन्हें 45 दिन की जेल काटनी पड़ी। इससे पहले भी वह आंदोलन में सक्रिय रहे और भारतीयों में स्वतंत्रता का संदेश पहुंचाने का काम करते थे।
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आंदोलन में भाग लेने के कारण डीएवी स्कूल ने उन्हें रेस्टिकेट कर दिया। हालांकि इससे शर्मा पर कोई खास असर नहीं पड़ा और वह लाहौर से क्रांतिकारियों का साहित्य दून पहुंचाने के काम में लगे रहे।

freedom fighter Satyeshwar Sharma pass away in dehradun
Satyeshwar Sharma

साथ ही वह आंदोलनकारियों के अखबार ‘ढिंढोरा’ को दून के घर-घर तक पहुंचाने में भी जुटे रहे। महाराजा अग्रसेन चौक के पास उन्हें अखबार के बंडल दबाए हुए मिलते थे, इसे वह गोपनीय तरीके से आंदोलनकारियों तक पहुंचाते थे।

आजादी के बाद वह शिक्षा के क्षेत्र में चले गए। 1960 से 78 तक वह एसजीआरआर इंटर कॉलेज नेहरूग्राम के प्रधानाचार्य रहे। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने सैनानी का दर्जा पाने के लिए प्रयास शुरू किए। उस दौर के फोटो, जेल जाने की रिपोर्ट समेत अन्य सूचनाओं से जुड़े दस्तावेज लेकर एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर तक चक्कर काटते रहे।

बाद में चलने-फिरने में असमर्थ हुए तो पोता उदित नेताओं और अधिकारियों के दर पर भटकता रहा। लगभग सभी मुख्यमंत्री और अधिकारी प्रकरण में जल्द कार्रवाई का आश्वासन देते रहे हालांकि कोई कार्रवाई नहीं हुई। वह चाहते थे कि मौत से पहले उन्हें वह सम्मान मिले, जिसके वह हकदार हैं। हालांकि उनकी यह ख्वाहिश अधूरी ही रह गई।

सोमवार शाम तबियत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां से चिकित्सकों ने उन्हें घर ले जाने की सलाह दी। बुधवार सुबह घर पर उनका निधन हो गया। दोपहर बाद लक्खीबाग स्थित शमशान पर उनका अंतिम संस्कार किया। उनके पुत्र राकेश शर्मा ने उन्हें मुखाग्नि दी। वह अपने पीछे पत्नी राजेश्वरी शर्मा (90), बेटा, बहू, तीन बेटियां और दो पोते छोड़ गए हैं।

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