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Dehradun News: धोखे से तलाक कराना वकील साहब को पड़ा महंगा

Wed, 23 Jul 2025 12:26 AM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Wed, 23 Jul 2025 12:26 AM IST
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Fraudulent divorce proved costly for the lawyer
Iबार काउंसिल ऑफ इंडिया ने लगाया तीन लाख रुपये जुर्माना
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Iमहिला के पति के स्थान पर अपना पता देकर करवा दिया एकतरफा तलाक
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I एक अधिवक्ता को धोखे से तलाक करवाना महंगा पड़ गया। उन्होंने एक महिला मुवक्किल को तलाक दिलाने के लिए अदालत में उसके पति के पते की जगह अपने घर का पता दे दिया। इस कारण जो नोटिस पति को जाने चाहिए थे वो अधिवक्ता के घर पहुंचते रहे। उधर महिला का पति कोर्ट कार्यवाही से अनजान रहा। इधर नोटिस की लगातार अवहेलना के चलते अदालत ने महिला के पक्ष में एकतरफा तलाक का आदेश (डिक्री) दे दिया।
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Iमामले में देहरादून जिला अदालत के ही अधिवक्ता कृष्ण कुमार गोयल ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया की अनुशासन समिति में शिकायत दी। समिति ने अधिवक्ता रजनीश गुप्ता को कदाचार का दोषी ठहराते हुए तीन लाख रुपये जुर्माना भरने की सजा सुनाई है। आदेश में कहा है कि दो सप्ताह के भीतर जुर्माना जमा करें अन्यथा छह महीने के लिए सदस्यता निलंबित होगी।शिकायतकर्ता गोयल के अनुसार अधिवक्ता गुप्ता ने देहरादून की फैमिली कोर्ट में महिला मुवक्किल के लिए तलाक की याचिका दायर की थी। याचिका में पति के पते के स्थान पर अपने रायपुर स्थित घर का पता दे दिया।
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Iफैमिली कोर्ट ने महिला के पति को पक्ष रखने के लिए नोटिस भेजे लेकिन वे नोटिस तो अधिवक्ता गुप्ता के घर पहुंचते रहे। उनके घर से कथित तौर पर नोटिस लेने से इन्कार होता रहा। दूसरी ओर अधिवक्ता गुप्ता अदालत से यह मांग भी करते रहे कि दूसरा पक्ष जानबूझकर नोटिस को नजरअंदाज कर रहा है इसलिए एकतरफा फैसला दिया जाए। इस तरह महिला मुवक्किल के पक्ष में एकतरफा डिक्री करवा ली।
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Iदोषी अधिवक्ता की दलील खारिज
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Iअनुशासन समिति के सामने अधिवक्ता रजनीश गुप्ता ने पक्ष रखा कि जिस पते को उनका बताया जा रहा है उससे उनका कोई सरोकार नहीं है। कहा कि वह मामले में केवल सहायक वकील थे। समिति ने फैसले में कहा है कि उस पते पर बिजली मीटर के कनेक्शन से साफ हो गया कि वह अधिवक्ता का पता था। अधिवक्ता जिस दूसरे घर को अपना पता बताकर दस्तावेज पेश कर रहे हैं वे सभी 2012 के बाद जारी हुए जबकि तलाक का मामला 2003 में तय हो गया था। समिति ने यह तर्क भी अस्वीकार किया कि वह मामले में केवल सहायक वकील थे क्योंकि वकालतनामा पर उनके हस्ताक्षर थे। समिति ने माना कि उन्होंने अदालत को गुमराह किया।I
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