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संस्कृत विवि के कुलपति की नियुक्ति में फर्जीवाड़ा
बिशन सिंह बोरा/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Thu, 04 Jun 2015 09:53 AM IST
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उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय हरिद्वार के कुलपति की नियुक्ति फर्जी प्रमाण पत्र के आधार होने का मामला सामने आया है।
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आरटीआई के तहत मांगी गई सूचना में जो प्रमाण पत्र उपलब्ध कराए गए हैं, उसमें कई गड़बड़िया हैं। प्रकरण के शिक्षा मंत्री के पास पहुंचने पर मंत्री ने मामले जांच के लिए कहा है। सामाजिक कार्यकर्ता श्याम लाल सुंदरियाल ने इस संबंध में सूचना मांगी थी, जिसमें मिली जानकारी से यह खुलासा हुआ है।
वहीं, संस्कृति विवि के कुलपति महावीर अग्रवाल का इस बारे में कहना है कि राजभवन ने उनसे प्रमाण पत्रों की प्रति मांगी थी। एक प्रति उन्होंने सूचना मांगने वाले व्यक्ति को दी है। कहा कि जो भी प्रमाण पत्र दिए हैं वह एकदम ठीक हैं। मामला सामने आने के बाद उक्रांद नेता मनमोहन लखेड़ा ने फिर से कुलपति पद पर महावीर अग्रवाल की नियुक्ति पर सवाल उठाए हैं।
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कहा कि पूर्व राज्यपाल डॉ. अजीज कुरैशी ने वर्ष 2013 में अग्रवाल को कुलपति के पद पर नियुक्ति दी, जबकि पहले से उन पर कई गंभीर आरोप थे। लखेड़ा ने कुलपति अग्रवाल के कार्यकाल में जिन आठ प्रोफेसरों की नियुक्ति हुई है, उस पर भी सवाल उठाए हैं।
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कहा कि अब मामले की जांच होगी तो सच्चाई सामने आ जाएगी। इसके साथ ही गलत तरीके से नियुक्ति पाने वाले करीब आठ प्रोफेसरों के खिलाफ भी कार्रवाई होगी।
मिली सूचना में ये गड़बड़ियां आ रहीं सामने
सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत जो प्रमाण पत्र मिले हैं उसमें कुलपति को मध्यमा नवीं एवं दसवीं की परीक्षा सन 1966 में पास करने और अंक तालिका एक सितंबर 1976 में जारी होना दर्शाया गया है। 1976 को जारी की गई मध्यमा की अंक तालिका में पिता का नाम गायब है।
तीन वर्षीय शास्त्री परीक्षा 1968 में श्रीमद्धयानंद आर्ष विद्यापीठ गुरुकुल झज्जर, रोहतक, हरियाणा से एवं इसी महाविद्यालय से दो वर्षीय आचार्य की डिग्री 1969 से करना दर्शाया है। सवाल यह है कि दो वर्ष के पाठ्यक्रम को एक साल में कैसे पूरा किया गया। मामले में बताया गया है कि 1968 में जिस विद्यापीठ से शास्त्री की गई उसे 1968 तक मान्यता ही नहीं थी।