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Forest Fire: उत्तराखंड-हिमाचल के पहाड़ों से बर्फ गायब...हसीन वादियों में सात गुना बढ़ीं आग की घटनाएं

Tue, 23 Jan 2024 02:09 PM IST
अलका त्यागी अमर उजाला नेटवर्क, शिमला/ देहरादून
अमर उजाला नेटवर्क, शिमला/ देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Tue, 23 Jan 2024 02:09 PM IST
सार

भारतीय वन सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार हिमाचल में 16 अक्टूबर 2023 से 16 जनवरी 2024 तक वनाग्नि की 2050 घटनाएं रिकॉर्ड की गई हैं। पिछले साल के इन्हीं महीनों में महज 296 घटनाएं हुईं थीं। यानी कि इस साल लगभग 7 गुना वृद्धि दर्ज की गई है।

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Forest Fire incidents increased seven times in Uttarakhand and Himachal Due to less Snow
जंगल में आग - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सर्दियों में बर्फ से ढकी रहने वाली हिमाचल की हसीन वादियों से बर्फ गायब है और वहां इन दिनों आग की लपटें और धुंआ दिखाई दे रहा है। यही हाल उत्तराखंड के पहाड़ों का भी है। पिछले तीन महीनों से हिमाचल में इस बार न ही तो बारिश हुई है और न ही बर्फबारी देखने को मिली है। जंगलों में नमी न होने से इस बार प्रदेश में वनाग्नि की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि देखने को मिली है।

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आंकड़ों के अनुसार प्रदेश के सभी जिलों में आग की घटनाएं हुईं। पिछले तीन सप्ताह में किन्नौर, मनाली, कुल्लू, चंबा और शिमला जिला में आग की बड़ी घटनाओं में हजारों हैक्टेयर वन भूमि को नुकसान पहुंचा है और रिहायशी मकान भी आग की चपेट में आए हैं। भारतीय वन सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक सप्ताह में देश में वनाग्नि की बड़ी घटनाओं में शीर्ष पांच राज्यों में हिमाचल पहले स्थान पर है। हिमाचल में पिछले एक सप्ताह में 36 बड़ी आग की घटनाएं देखने को मिली हैं। वर्ष 2022-23 में बड़ी आग की घटनाओं में शीर्ष में रहने वाले पांच राज्यों में हिमाचल 123 घटनाओं के साथ पहले स्थान पर था और उत्तराखंड दूसरे, आंध्र प्रदेश तीसरे और जम्मू एवं कश्मीर चौथे स्थान पर था। वहीं 2023-24 में फायर अलर्ट के मामलों में शीर्ष के पांच राज्यों में हिमाचल दूसरे स्थान पर और उत्तराखंड पहले स्थान पर है।
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अग्निशमन विभाग के आंकड़ों के अनुसार दिसंबर माह में आग की कुल 369 घटनाएं हुईं। इनमें 275 वनाग्नि की घटनाएं थीं। इन घटनाओं में 10 करोड़ रुपए की संपत्ति का नुकसान हुआ। 1 से 12 जनवरी तक प्रदेश में 149 आग की घटनाएं दर्ज की गई हैं।

अभी तक सामान्य से 100 फीसदी कम बारिश हुई
मौसम विभाग के अनुसार प्रदेश में जनवरी माह में अभी तक सामान्य से 100 फीसदी कम बारिश हुई है। वनाग्नि की दृष्टि से हिमाचल प्रदेश के 12 जिलों में से 8 जिले संवेदनशील माने जाते हैं। यहां का सबसे अधिक संवेदनशील समय अप्रैल के दूसरे सप्ताह से जून तक है, लेकिन इस बार आग की घटनाएं सर्दियों के दिनों में भी अधिक देखने को मिल रही हैं। इसकी मुख्य वजह बारिश और बर्फबारी न होने की वजह से जंगलों की नमी गायब हो गई है।

प्रदेश के चीड़ वन आग के लिए सबसे ज्यादा संवेदनशील
अधिकृत आंकड़ों के अनुसार हिमाचल में 37,033 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र है। इनमें से 15 प्रतिशत पर चीड़ वन हैं जो आग के लिए सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं। प्रदेश में वन विभाग की कुल 2026 बीटें हैं, इनमें से 339 अति संवेदनशील श्रेणी में आती हैं। इसके अलावा 667 मघ्यम और 1020 बीटें कम संवेदनशील की श्रेणी में आती हैं।

मौसमी चुनौतियों से घिरे उत्तराखंड के पहाड़
9 से 16 जनवरी के बीच उत्तराखंड में 600 से अधिक वनाग्नि के अलर्ट जारी किए जा चुके हैं। देशभर में सबसे ज्यादा फायर अलर्ट उत्तराखंड में आए। 400 से अधिक फायर अलर्ट के साथ हिमाचल प्रदेश दूसरे और तकरीबन 250 अलर्ट के साथ जम्मू-कश्मीर तीसरे स्थान पर है। अरुणाचल प्रदेश में भी 200 के आसपास अलर्ट जारी किए गए हैं। वनअधिकारियों के अनुसार बारिश न होने से सर्दियों में वनों में जगह-जगह आग लगने की सूचनाएं मिल रही हैं। वन विभाग भी इस समय कंट्रोल बर्निंग कर रहा है। मॉनसून के बाद बारिश न होने से जंगल में सूखी पत्तियों का ढेर जमा है जिससे गर्मियों में आग भड़क जाती है। इसलिए विभाग नियंत्रित आग के जरिये जंगल की सफाई करता है। इससे भी लोगों को धुआं दिख रहा है। ग्रामीणों को आग के प्रबंधन के लिए जागरूक किया जा रहा है। वे इस समय खेतों की सफाई या जंगल में आग लगाकर न छोड़ें।

उत्तराखंड में 1 से 16 जनवरी के बीच बारिश और बर्फबारी नहीं
मौसम विभाग के अनुसार इस वर्ष 1 से 16 जनवरी के बीच उत्तराखंड में बारिश बर्फबारी देखने को नहीं मिली। नैनीताल में नाममात्र 0.8 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्यतः इस दौरान 14 मिमी. तक बारिश होती है। इसी तरह अल्मोड़ा, बागेश्वर में 15 मिमी से अधिक, चमोली में 20 मिमी और रुद्रप्रयाग उत्तरकाशी में इस समय तक 28 और 26 मिमी तक बारिश होनी चाहिए लेकिन चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ समेत सभी पर्वतीय जिलों में सामान्य से 100 प्रतिशत कम यानी कोई बारिश नहीं हुई। दिसंबर-2023 भी तकरीबन सूखा गया। तीन हिमालयी राज्यों जम्मू कश्मीर और लद्दाख (-79), हिमाचल प्रदेश (-85) और उत्तराखंड (-75) में सामान्य से बेहद कम बारिश दर्ज हुई।

पिछले कुछ वर्षों में बारिश और बर्फवारी में लगातार कमी
पिछले कुछ वर्षों में मॉनसून के बाद बारिश और बर्फबारी में लगातार कमी दर्ज की जा रही है। नवंबर और दिसंबर में तकरीबन न के बराबर बारिश और बर्फबारी हुई। इससे पहले 2006, 2007, 2008 और 2009 में भी मानसून के बाद काफी कम बारिश हुई थी। तकरीबन 4 साल सूखी सर्दियां रहीं। मानसून के बाद सर्दियों की जलवायु में इस तरह केउतार-चढ़ाव लगातार देखने को मिल रहे हैं।

खेती, किसानी और पर्यटन सब कुछ प्रभावित हो रहा है
जानकारों का कहना है कि बारिश न होने का असर खेती और बागवानी में भी दिखाई दे रहा है। सर्दियों में लगाए जाने वाले फलदार पौधों को पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है। सेब, आडू, प्लम, खुबानी और कीवी समेत सभी फसलें प्रभावित हो रही हैं। बारिश पर निर्भर खेतों में अब तक गेहूं और जौ के बीज भी बाहर नहीं निकले हैं। बर्फबारी न होने के कारण पर्यटन व्यवसाय पर भी इसका खासा असर पड़ा है। पर्यटन व्यवसाय 20 प्रतिशत के आसपास भी नहीं पहुंच पाया।एक तरह से पूरा विंटर टूरिज्म ठप हो गया। बद्रीनाथ में बेहद हलकी बर्फ गिरी है। जलते जंगल से लेकर पेयजल संकट तक पहाड़ मौसमी चुनौतियों से घिरे हैं।

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