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अब टेसू के बगैर फागुन नहीं रहेगा अधूरा
कमलेश मेहता/ अमर उजाला, हल्द्वानी
Updated Wed, 12 Mar 2014 12:53 PM IST
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मौसम बसंत का जब भी आएगा, अपने आंगन में खुशबू लाएगा, चहचहाती चिड़िया-सी गाना तुम, दूर गगन में नहीं उड़ जाना तुम, फूल पलाश के चुन के लाना तुम।
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कोलकाता और सोनभद्र से मंगाया गया टेसू
बेहद आकर्षक इस फूल पर न जाने इस तरह कितनी रचनाएं लिखी गईं, लेकिन अब पलाश यानी टेसू के फूलों की कमी का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि मथुरा के मंदिरों में होली खेलने के लिए इस बार कोलकाता और सोनभद्र (पूर्वी यूपी) से 40 रुपए किलो टेसू मंगाया गया है।
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उस टेसू को अब यहां जंगलात बचाने की कोशिश कर रहा है। पलाश को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। इसे टेसू और ढाक (वही ढाक जिस पर कहावत है ‘ढाक के तीन पात’) भी कहते हैं।
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खूबसूरती के चलते इसे ‘जंगल की आग’ भी कहा जाता है। जब पेड़ों की अंधाधुंध कटाई शुरू हुई, तब पलाश के पेड़ों पर भी आरी चली। हल्द्वानी में एक ही पेड़ (रामपुर रोड पर) इसका बचा है।
प्रजातियों को बचाने की कोशिश शुरू
यह फूल केवल होली के समय में गीत और किताबों तक न सिमट जाए, इसलिए जंगलात ने टेसू जैसे रंग वाली प्रजातियों को बचाने की कोशिश शुरू की है।
वन अनुसंधान नर्सरी में पलाश के पौधों को तैयार किया जा रहा है, जिन्हें बरसात के मौसम में वन परिसरों और जंगलों में लगाया जाएगा। जुलाई तक 2000 पौधों को तैयार करने का लक्ष्य है। कुछ पौधों को स्कूलों को भी निशुल्क बांटा जाएगा।
मुख्य वन संरक्षक अनुसंधान एसके सिंह का कहना है कि प्राचीन काल से ही प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल होता रहा है। इनमें पलाश के अलावा एक प्रजाति धोबीनट (भिलावा) भी है।
नट की प्रजाति भी संकट में
धोबी कपड़ों की पहचान के लिए जो निशान बनाता था, उसमें नट का इस्तेमाल होता था। यह प्रजाति भी संकट में है। इसके संरक्षण के लिए धोबीनट की पौध तैयार की जा रही हैं। पहाड़ में किलमौड़ा से भी रंगने की परंपरा है। इस प्रजाति को भी नर्सरी में तैयार किया है।
टेसू के फूलों को उबालने से ललाई लिए हुए पीला रंग निकलता है, जिसका इस्तेमाल खास तौर पर होली के मौके पर किया जाता है। टेसू की फली को पीसने के बाद वह अबीर का काम करती है।
पेट के कीड़ों के लिए रामबाण है टेसू
आयुर्वेद चिकित्सक डॉ. विनोद जोशी कहते हैं कि टेसू स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभकारी है। इसके बीज पेट के कीड़ों के लिए रामबाण होते हैं। फूल का इस्तेमाल अत्याधिक रक्तस्राव रोकने में भी होता है।
इसकी जड़ से पलाश अर्क बनता है, जिससे नेत्र की ज्योति बढ़ती है। इसका इस्तेमाल गोरापन बढ़ाने में होता है। इसके अलावा त्वचा की एलर्जी होने पर भी इसका इस्तेमाल होता है।