जानिए, ये हैं कांग्रेस की 'करारी हार' की पांच वजहें
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उत्तराखंड में कांग्रेस को करारी हार मिली है। यह सच है पूरे देश में चले मोदी फैक्टर ने यहां भी काम किया है लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार और कांग्रेस सरकार को मतदाताओं ने पूरी तरह नकारा है।
कांग्रेस कहां, कैसे और क्यूं फेल हुई है इसके एक नहीं कई कारण हैं।
कम से कम उत्तराखंड में जीत का बड़ा अंतर कांग्रेस को पाटने में लंबा वक्त लगेगा। फौरी तौर पर कांग्रेस को पांच सवालों के जवाब तो तलाशने ही होंगे। जानिए, क्या है कांग्रेस की असफलता की पांच वजहें।
नेतृत्व को लेकर दो साल से खींचतान
प्रदेश में कांग्रेस की सरकार करीब दो साल से है। इन दो सालों में पहले दिन से विजय बहुगुणा के खिलाफ लगातार कांग्रेस ही लड़ती रही। अब तीन महीने से दूसरे मुख्यमंत्री हरीश रावत के खिलाफ भी कांग्रेस मोर्चा खोले है।
दो सालों से चल रही खींचतान के चलते ही मतदाताओं ने कांग्रेस को सबक सिखाया है। तीन महीने पहले हुए नेतृत्व परिवर्तन के बाद भी दूसरे गुट अपनी-अपनी मुहिम में खुलकर लगे रहे।
सरकारी स्तर पर लिए गए फैसलों को अपने-अपने ढंग से पेश करने और श्रेय लेने की होड़ मची रही। कुल दो साल के कार्यकाल को तीन और 21 महीनों में बांटकर देखा जा रहा था।
प्रदेश अध्यक्ष का संगठन से मोह भंग
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष यशपाल आर्य का पिछले साल नवम्बर में ही संगठन से मोहभंग हो गया था। आलाकमान की इच्छा से इतर उन्होंने अपना इस्तीफा सौंप दिया था।
मुख्यमंत्री बनने पर हरीश रावत उन्हें अपने साथ बतौर अध्यक्ष खींचते तो रहे लेकिन आर्य ने ना तो निचले स्तर पर संगठन केढांचे को मजबूत दे सके और ना ही बतौर अध्यक्ष उनकी भूमिका कहीं दिखी। कांग्रेस की जिला-मंडल इकाईयों का खस्ताहाल ढांचा और उपेक्षा भी पार्टी को इस दशा में ले गई है।
कांग्रेस ने उम्मीदवारी तय करते समय निचले स्तर पर नाम तो मांगे लेकिन ऊपर के कुछ नेताओं ने बैठकर सब कुछ तय कर लिया। पौड़ी, हरिद्वार और टिहरी सीट पर फैसला कुछ नेताओं ने ही कर लिया। टिकट बंटवारे में देरी और बड़े नेताओं का इंकार भी संगठनात्मक कमजोरी को दर्शाता है।
महाराज का असंतोष ले डूबा
सोनिया गांधी के समय ना देने और पार्टी में उपेक्षा के चलते सतपाल महाराज ने कांग्रेस छोड़ी। देहरादून और दिल्ली में बैठे कांग्रेस के रणनीतिकारों को इसकी भनक तक नहीं लगी।
सतपाल महाराज ने खुलकर प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी मांगी थी। पार्टी ने जातिगत समीकरण बता उन्हें पौड़ी से ही लड़ने को कह दिया। जबकि कांग्रेस को महाराज की राजनीतिक ताकत अंदाजा था। उन्होंने नारायण दत्त तिवारी के साथ कांग्रेस छोड़कर पौड़ी में ताकत दिखाई थी।
महाराज के जाने के बाद कांग्रेस ने ग्राउंडलेबल पर उनकी काट ना तैयार कर बयानबाजियों की जंग शुरू कर दी जबकि पार्टी को पता था कि उनकी पत्नी अमृता रावत समेत उनके समर्थक विधायक कम से कम महाराज के खिलाफ कुछ सुनना पसंद नहीं करते हैं।
पौड़ी संसदीय सीट की विधानसभाओं के नतीजे साफ बता रहे हैं कि मोदी के साथ महाराज भी कहीं ना कहीं मौजूद हैं।
मोदी की लहर और निगेटिव प्रचार
कांग्रेस के सभी बड़े नेता मोदी की लहर को कहर, गुब्बारा और हवाहवाई चुनाव बताने में जुटा रहा। कांग्रेस के बड़े नेता भी उत्तराखंड में प्रचार के लिए आए तो मोदी ही उनके निशाने पर रहे।
कांग्रेस इस बात को कतई नहीं भांप पाई की जो मतदाता मोदी के पक्ष में मतदान की तैयारी कर रहा है उसके सामने निगेटिव प्रचार और नुकसान पहुंचा रहा है। मोदी की रैली और बाद में हुई चुनावी जनसभाओं में जो लोग पहुंचे उन्हें भाड़े के और बाहरी ठहराया गया।
राष्ट्रीय नेता जिस तरह से मोदी पर हमला बोल रहे थे उसी तर्ज पर कांग्रेस के प्रवक्ताओं की टीम बारी-बारी बड़े-बड़े शब्दों के साथ निशाना साध रही थी। इस सब में पॉजिटिव प्रचार कहीं दूर चला गया।
पार्टी से ज्यादा अपनी जमीन की चिंता
उत्तराखंड में कांग्रेस की राजनीति शुरू से गुटों में बंटी है। इसकी शुरूआत चुनाव के पहले से हो गई थी जब यह बात सामने आयी कि मुख्यमंत्री हरीश रावत पौड़ी-टिहरी को छोड़कर तीन सीटें जिताने का आश्वासन आलाकमान से कर आए हैं।
चुनाव में ऊपरी तौर पर तो कांग्रेस एक दिख रही थी लेकिन सच्चाई कुछ उलट थी। टिहरी सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा अपनी जमीन बचाने में जुटे थे। इतना ही नहीं उनके समर्थक विधायकों का उद्देश्य भी साकेत बहुगुणा की जीत तक था।
हरीश रावत ने शुरूआती दौर में बात भले तीन सीटों की हो लेकिन आखिर में वह भी हरिद्वार तक सिमट गए। हरक सिंह को पार्टी के दबाव में चुनाव लड़ना पड़ा जो आखिर तक अपनी जमीन तलाशते रहे। कांग्रेस के तमाम विधायक अपना-अपना क्षेत्र छोड़कर राजनीतिक आकाओं की जमीन बचाने में जुटे रहे।