शिक्षक दिवस पर विशेष: सप्तऋषियों के सात आश्रमों से निकाला था पहला ज्ञान
- गुरु शिक्षकों की प्राचीन तपो भूमि है मायापुरी
- वेद, संस्कृत और प्राच्य शिक्षा का बड़ा केंद्र
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हरिद्वार स्थित गंगा के तट पर युगों से सप्तऋषियों के सात आश्रम विद्यमान थे। गंगा जब आई तब इन ऋषियों के आश्रमों को छोड़कर सात धाराओं में बंटकर आगे बढ़ी। इन्हीं सात ऋषियों ने धरती वासियों को अपने गुरुकुलों के माध्यम से पहला ज्ञान दिया। गुरुओं और शिक्षकों की तपोभूमि मायापुरी शिक्षा का बड़ा केंद्र रही है।
जिस स्थल पर सप्तऋषियों के आश्रम थे, उस स्थल को आज भी सप्तऋषि क्षेत्र कहा जाता है। त्रेतायुग में जब गंगा धरती पर आई तो इन सातों ऋषियों के आश्रम को छोड़कर सप्त धाराओं में बंटते हुए आगे बढ़ी। इसी कारण इस क्षेत्र को सप्तसोवार क्षेत्र भी कहते हैं। इन ऋषियों में विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ और कश्यप हरिद्वार में आश्रम बनाकर शिक्षा देते थे
धरती के पहले शिक्षक थे सातों ऋषि
ये सातों ऋषि धरती के पहले शिक्षक थे। देश भर के राजकुमारों सहित साधरण जनता इन ऋषियों से पढ़ने आती थी। कुंभ आदि मेलों पर हिमालयों की गुफाओं से ऋषि-मुनि अपना सृजित ज्ञान समाज को बांटने इसी धरती पर आते थे। आज भी कुंभ मेलों पर विशाल दीक्षा समारोह धर्मनगरी में आयोजित किए जाते हैं। यह नगरी वैदिक कर्मकांड का भी बड़ केंद्र रही है।
आज भी हरिद्वार में संस्कृत शिक्षा प्रदान करने वाले 28 विद्यालय और महाविद्यालय मौजूद हैं। संस्कृत विश्वविद्यालय और संस्कृत अकादमी के अलावा प्राच्य विद्याओं से जुड़े गुरुकुल और पतंजलि विश्वविद्यालय यहीं हैं। कर्मकांड शिक्षा का बड़ा केंद्र ऋषिकुल विद्यापीठ के रूप में स्थापित है तो कर्मकांड की शिक्षा देने के लिए 12 कर्मकांड वेद विद्यालय चल रहे हैं। ऋषियों की यह अनादि भूमि आरंभ से ही शिक्षा का प्रचार करती रही है।