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उत्तराखंड : किसान नहीं जलाएंगे पराली, अब बनेगा पशुओं के लिए चारा
Mon, 06 Jul 2020 02:42 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Mon, 06 Jul 2020 02:42 PM IST
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खेतों में जलती पराली
- फोटो : अमर उजाला
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राष्ट्रीय सहकारी विकास परियोजना के तहत अब ऊधमसिंह नगर, हरिद्वार आदि क्षेत्रों में पराली और अन्य फसलों के अवशेष को खरीदा जाएगा। यह खरीद परियोजना के तहत चारा बनाने के काम आएगी और इन दो जिलों में फसल के बचे हुए हिस्से को जलाने की व्यवस्था पर अंकुश लगेगा।
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राष्ट्रीय सहकारी विकास परियोजना के तहत इस समय मक्के का उपयोग कर पशु चारा बनाया जा रहा है। इसी हरे चारे में मिलाने के लिए धान, गेहूं आदि फसलों के बचे के हुए हिस्से की खरीद सीधे किसानों से की जाएगी। परियोजना के तहत की जा रही खरीद से सीधे दो फायदे होंगे।
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एक किसानों को अपने खेतों में पराली और अन्य फसलों के बचे हुए हिस्से को जलाना नहीं पड़ेगा। दूसरा, साइलेज या पशु चारे की कमी को भी पूरा किया जा सकेगा। सहकारिता की यह योजना पर्यावरण से सीधे जुड़ी हुई है। हर साल पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण पर भी रोक लगेगी।
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-10 हजार मीट्रिक टन की पहले चरण में इसी अक्तूबर-नवंबर माह में खरीद की तैयारी है। खरीद के लिए दाम अभी तय होने हैं और अधिकारियों का कहना है कि यह खरीद उसी दर पर होगी, जिससे किसानों को फायदा ही हो। साइलेज उत्पादन और मांग बढ़ने के साथ ही अगले चरण में खरीद की मात्रा बढ़ाई जाएगी।
-50 हजार मीट्रिक टन पराली और अन्य फसलों का अवशेष को जला दिया जाता है हर साल। केवल ऊधमसिंह नगर में ही तीन लाख मीट्रिक टन से अधिक पैदावार धान की है। अनुमान है कि इसका एक पांचवा हिस्सा खेतों को अगली फसल के लिए तैयार करने के लिए जला दिया जाता है।
-30 प्रतिशत करीब दूध की मात्रा बढ़ जाती है इस चारे को पशुओं को खिलाने पर। डेयरी निदेशक जयदीप अरोड़ा ने बताया यह स्थानीय स्तर पर किए गए प्रयोग से सामने आया है।
-20 हजार मीट्रिक टन पशु चारे का उत्पादन होगा। अभी ढाई हजार मीट्रिक टन का उत्पादन ही हो पा रहा है। चारे की प्रदेश में डिमांड करीब 12 हजार मीट्रिक टन है। पराली और अन्य डंठलों का उपयोग करीब 15 प्रतिशत तक टीएमआर या पशु चारे में किया जाएगा।
ये है समस्या
पंजाब, हरियाणा की तरह ही उत्तराखंड में भी अक्टूबर और नवंबर के महीनें में किसान धान के फसल के बचे हुए हिस्से को जला देते हैं। इसका पीछे वजह खेत को 10 से 15 दिन के अंदर दूसरी फसल के लिए तैयार करना होता है।
पराली और अन्य फसलों के ठूंठ को जलाने पर एनजीटी ने भी प्रतिबंध लगाया हुआ है। इसके बावजूद यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। इससे अक्तूबर और नवंबर में दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर भी खासा बढ़ जाता है। हाल ही में फसलों के बचे हुए हिस्से को जलाने से किसानों को रोक पाने पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को फटकार भी लगाई थी।