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एक्सक्लूसिव: चंबल नदी की रेत से रोकी जाती है रेलवे ट्रैक की फिसलन

Sun, 27 Dec 2020 04:39 PM IST
अलका त्यागी विजेंद्र श्रीवास्तव/ राजेश नेगी, अमर उजाला, हल्द्वानी
विजेंद्र श्रीवास्तव/ राजेश नेगी, अमर उजाला, हल्द्वानी Published by: अलका त्यागी Updated Sun, 27 Dec 2020 04:39 PM IST
सार

  • लालकुआं से काठगोदाम के 22 किमी ट्रैक के लिए सर्दियों में की जाती है यह व्यवस्था
  • फिसलन से बचने के लिए सैंडिंग गियर के जरिये ट्रैक पर डाली जाती है रेत

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Exclusive: railway track Slippery is prevented by sand of Chambal river
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : पेक्सेल्स

विस्तार

लालकुआं से काठगोदाम आने वाली रेलगाड़ियां सवारियों के साथ रेत भी लेकर पहुंचती हैं। चौंकिए नहीं, यह सच है। सर्दियों में ओस के चलते रेलवे ट्रैक पर नमी होती है। इससे ट्रेनों के पहियों के फिसलने का खतरा रहता है। बरसात में भी यह दिक्कत आती है।

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इस समस्या से निपटने के लिए इंजन और तीन डिब्बों में 45 किलो रेत रखकर लालकुआं से रेलगाड़ी को काठगोदाम की ओर रवाना किया जाता है। इसके बाद इंजन में मौजूद सैंडिंग गियर के जरिये ट्रैक पर रेत को गिराया जाता है ताकि फिसलन न हो। यह रेत चंबल नदी की होती है।
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दरअसल, लालकुआं से काठगोदाम के बीच ट्रैक की ऊंचाई बढ़ने लगती है। लालकुआं रेलवे स्टेशन समुद्र तल से 256.52 मीटर और काठगोदाम स्टेशन 509 मीटर ऊंचाई पर है। दोनों स्टेशनों के मध्य करीब 22 किमी का ट्रैक है।
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पूर्वोत्तर रेलवे इज्जतनगर मंडल के रेलवे ट्रैफिक इंस्पेक्टर एमआर आर्य बताते हैं कि ट्रैक की ऊंचाई बढ़ने से इंजन पर ज्यादा दबाव पड़ता है। सर्दियों में रेलवे ट्रैक पर ओस पड़ी रहती है। ऐसे में ट्रैक गीला रहता है, जिससे ट्रैक पर फिसलन रहती है।

इस समस्या से निपटने के लिए लालकुआं से सवारी गाड़ियों में रेत रखी जाती है। यह प्रक्रिया वर्ष 2007 से चली आ रही है। इससे पहले भी पहियों के फिसलने की समस्या थी। तब एक इंजन अलग से भेजा जाता था।  

आजकल यह रेत चंबल नदी (भरतपुर राजस्थान) की आ रही है। बरसात के लिए भी यह व्यवस्था की जाती है। हालांकि हाल के सालों में व्हील फिसलन के मामले सामने नहीं आए हैं। काठगोदाम रेलवे स्टेशन अधीक्षक चयन राय कहते हैं कि जब ट्रेन काठगोदाम स्टेशन पहुंच जाती है तो यहां भी पहियों के नीचे गुटके लगाए जाते हैं। साथ ही चेन से भी इसे बांधा जाता है।

सुपरवाइजर तैनात किया गया  

रेलवे ट्रैफिक इंस्पेक्टर एमआर आर्य बताते हैं कि जो भी ट्रेन (रामपुर से काठगोदाम) चलती हैं, उसमें एक सुपरवाइजर तैनात किया गया है। यह सुपरवाइजर लोको पायलेट की मदद करता है। सिग्नल आने की सूचना देने के लिए पटाखों का भी इंतजाम किया गया है।

इसके साथ ही फॉग सेफ्टी डिवाइस भी लगाया गया है, जो लोको पायलेट को आने वाले सिग्नलों की सूचना देता है। ये सभी कदम सुरक्षा के मद्देनजर उठाए गए हैं। वर्तमान में काठगोदाम-हावड़ा, काठगोदाम-दिल्ली-जैसलमेर, नैनी-दून जनशताब्दी और काठगोदाम- दिल्ली शताब्दी स्पेशल ट्रेनों का संचालन हो रहा है।

इंजन में सैंडिंग गियर होता है। इसमें स्थायी तौर पर भी रेत रखी होती है ताकि पहियों के फिसलने का खतरा न हो।
-राजेंद्र सिंह, पूर्वोत्तर रेलवे इज्जतनगर मंडल।

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