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एक्सक्लूसिव : उत्तराखंड में डेढ़ सौ से अधिक वनस्पति प्रजातियों के अस्तित्व पर खतरा
Fri, 11 Dec 2020 03:30 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal
सुरेंद्र कुमार वर्मा, अमर उजाला, पंतनगर
सुरेंद्र कुमार वर्मा, अमर उजाला, पंतनगर
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Fri, 11 Dec 2020 03:30 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Social media
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वनस्पति प्रजातियां ही जैव विविधता की मूल होती हैं। इनके सुचारु कार्य करने पर ही प्रकृति में संतुलित और समृद्ध जैव विविधता का निर्माण होता है। एक अध्ययन के अनुसार उत्तराखंड में पेड़ पौधों की 4048 प्रजातियां हैं। इनमें 116 प्रजातियां ऐसी हैं जो सिर्फ इसी राज्य में पाई जाती हैं। डेढ़ सौ से अधिक प्रजातियां ऐसी हैं जिनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। इन प्रजातियों का पर्यावरण के संतुलन में विशेष योगदान होता है और इनसे स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण होता है।
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विश्व में जैव विविधता के 36 मुख्य हॉटस्पॉट हैं। इनमें से भारत का हिमालयी क्षेत्र भी एक है। बढ़ती जनसंख्या, प्रकृति में मानवीय हस्तक्षेप और बढ़ता प्रदूषण जैव विविधता के समाप्त होने के मुख्य कारक है। जैव प्रौद्योगिकी परिषद के वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. मणिन्द्र मोहन शर्मा ने बताया कि पृथ्वी पर परंपरागत दवाइयां और भोजन पौधों से ही प्राप्त होते हैं।
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वैज्ञानिकों ने अब तक 1.7 मिलियन जीवों की प्रजातियों का वर्णन किया है, जो पृथ्वी पर संतुलित जैव विविधता का निर्माण करती हैं। एक अध्यन के अनुसार उत्तराखंड की डेढ़ सौ से अधिक प्रजातियां ऐसी हैं जिनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। पादपों की विदेशी प्रजातियों के दखल से भी जैव विविधता को खतरा बढ़ा है।
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पार्थेनियम (गाजर घास) अमेरिकी/मैक्सिको की मूल की प्रजाति है। यह आज विश्व में बड़ी तेजी से पांव फैला रही है और विश्व के सात सर्वाधिक हानिकारक पौधों में शुमार है। इसके अलावा लैंटाना, युपेटोरियम एवं एजिरेटम भी मुख्य है।
जैव विविधता पर भारी असंतुलित पर्यावरण
वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. शर्मा के अनुसार संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2024 तक भारत की जनसंख्या 144 करोड़ तक पहुंच जाएगी और 2027 तक यह संख्या चीन से 25 प्रतिशत अधिक हो जाएगी। बढ़ती जनसंख्या और प्रदूषण से पर्यावरण के हालात दिन-प्रतिदिन बद से बदतर होते जा रहे हैं।
पर्यावरण के बिगड़ते स्वरूप में 45 प्रतिशत योगदान ग्रीन हाउस गैसों और जलवायु परिवर्तन का है। भारत में बीस क्यूविक मीटर बोतलबंद जल को बनाने में लगभग 4,280 किग्रा. कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है, जो ग्रीन हाउस गैसों का एक प्रमुख घटक है।
आग और विदेशी प्रजातियों के दखल से भी खतरा
जंगलों में लगने वाली आग भी जैव विविधता के लिए खतरनाक है। ऐसी प्रजातियां जो किसी अन्य देश या प्रदेश से प्रवेश कर के अपने अस्तित्व को बढ़ाती हैं और स्थानीय प्रजातियों को पनपने का अवसर नहीं देतीं, जिससे देशी प्रजातियों का विघटन शुरू होने लगता है या विलुप्त होने लगता है। विदेशी प्रजातियां देशी प्रजातियों के हिस्से का स्थान, भोजन, पानी आदि का उपयोग अपनी वृद्धि के लिए करने लगती हैं। इससे देशी प्रजातियां जीवित नहीं बच पाती हैं।