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Dehradun News: कौरव और पांडव की शत्रुता बरकरार, बिस्सू पर भिड़ते हैं दोनों के वंशज

Tue, 09 Apr 2024 03:45 AM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Tue, 09 Apr 2024 03:45 AM IST
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Enmity between Kaurava and Pandava continues, descendants of both clash on Bisu
जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर की लोक संस्कृति में महाभारतकालीन इतिहास रचा बसा है। यहां आज भी कौरव और पांडव के वंशज अपने पुरखों के बीच हुए युद्ध का प्रदर्शन करते हैं। बिस्सू पर्व की शुरुआत फुलियात और ठोडा नृत्य से होती है। इसमें कौरव और पांडव के वशंज नृत्य करते हुए एक दूसरे पर लकड़ी के धनुष बाण से वार करते हैं। जब तक विरोधी पक्ष के योद्धा एक-एक कर मैदान छोड़ नहीं देते या सूर्यास्त नहीं होता, तब तक ठोडा नृत्य जारी रहता है। इस दौरान दर्शक लगातार शोर मचाते हुए योद्धाओं का उत्साहवर्धन करते हैं।
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15 अप्रैल को बिस्सू पर्व है। यमुना और टौंस घाटी के बीच जौनसार बावर के साथ उत्तरकाशी और टिहरी गढ़वाल के सीमांत क्षेत्रों में बिस्सू का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। सीमांत हिमाचल प्रदेश में सिरमौर और शिमला जिले में भी बिस्सू की धूम रहती है। इस अवसर पर बिस्सू मेले का भी आयोजन किया जाता है। पर्व के दिन लोग अपने इष्ट देवों को लकड़ी पर गूथे गए बुरांश के फूलों को अर्पित कर क्षेत्र में संपन्नता और सुख शांति के लिए उनका आभार प्रकट करते हैं। इस अवसर पर देव पूजन के बाद ठाेडा नृत्य किया जाता है। कौरव और पांडव के वंशज के बीच युद्ध की शैली में नृत्य होती है।
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शाठी (कौरव) और पासी (पांडव) पारंपरिक वस्त्रों और धनुष बाण से लैस होकर नृत्य करते हुए आपस में युद्ध करते हैं। रणसिंघा की तान और ढोल दमाऊ की थाप पर नृत्य होता है। नियमानुसार शाठी और पासी योद्धा (ठोडोरी) एक दूसरे के घुटनों के नीचे ही वार कर सकते है। लकड़ी का बाण लगने पर दर्द भी होता है। दोनों में किसी पक्ष के योद्धाओंं के मैदान से हटने तक युद्ध चलता है, हालांकि सूर्य के अस्त होने पर भी युद्ध समाप्त हो जाता है।
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लोक पंचायत के संस्थापक सदस्य भारत चौहान बताते हैं कि जौनसार बावर क्षेत्र गौरवमयी महाभारतकालीन इतिहास का साक्षात प्रमाण है। बताया कि यहां पांडव के अज्ञातवास में रहने कई साक्ष्य मौजूद हैं। बताया कि यहां के लोकनृत्यों और हारूल में पांडव से जुड़े संस्मरण शामिल रहते हैं।
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