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फेसबुक, ट्विटर से ज्यादा कारगर है चुनाव में रेडियो
सुधाकर भट्ट/अमर उजाला, देहरादून
Updated Fri, 28 Mar 2014 11:29 AM IST
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अगर जनगणना 2011 के आंकड़ों पर गौर किया जाय तो उत्तराखंड में प्रचार के लिए फेसबुक, ट्वीटर की जगह रेडियो, मोबाइल ज्यादा उपयोगी सिद्ध होगा।
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तीन पर्वतीय संसदीय क्षेत्र वाले उत्तराखंड में रेडियो आज भी करीब 14 प्रतिशत लोगों के पास है। दूसरी ओर घर में कम्प्यूटर, लैपटाप इंटरनेट का कनेक्शन रखने वाले सिर्फ 3.8 प्रतिशत ही लोग हैं। प्रदेश में मोबाइल रखने वाले करीब 62 प्रतिशत लोग है और इस मामले में उत्तराखंड का नंबर देश में पांचवा है।
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दुर्गम क्षेत्रों में रेडियो का प्रसार अधिक
जनगणना 2011 के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में कम्प्यूटर, लैपटॉप का उपयोग करने वाले सिर्फ 11 प्रतिशत लोग ही हैं। इनमें से भी केवल तीन प्रतिशत लोग ही हैं जो लैपटॉप के साथ इंटरनेट कनेक्शन लिए हुए हैं। दूसरी तरफ प्रदेश में 62 प्रतिशत घरों में टीवी है और 14 प्रतिशत घरों में रेडियो।
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दुर्गम क्षेत्रों में रेडियो का प्रसार अधिक है। प्रदेश में करीब 62 प्रतिशत लोग मोबाइल का इस्तेमाल कर रहे हैं। इन आंकड़ों से जाहिर है कि प्रदेश में प्रचार के लिए एक रेडीमेड प्रचार पर भरोसा करने वालों को मुंह की खानी पड़ सकती है।
रेडियो वाले मतदाताओं तक पहुंचना जरूरी
चुनावी माहौल को गरमाने के लिए फेसबुक और ट्वीटर कामयाब हो सकते हैं पर मतदाताओं तक पहुंचने के लिए राजनीतिक दलों को इस बात पर भी गौर करना पड़ेगा कि सोशल साइट तक पहुंचकर ही जन संचार खत्म नहीं हो पाता।
खासकर उन 14 प्रतिशत लोगों तक पहुंचना भी जरूरी है जो रेडियो का सहारा लेते हैं। इंटरनेट उपयोग के लिहाज से उत्तराखंड का नंबर प्रदेश में 14वां है।
मोबाइल उपयोग में उत्तराखंड का पांचवा नंबर
दूसरी ओर मोबाइल का उपयोग करने के लिहाज से देश में उत्तराखंड का नंबर पांचवा हैं। यह मान भी लिया जाए कि मोबाइल के जरिए फेसबुक से भी लोग जुड़े रह सकते हैं तो भी सोशल साइट्स की पहुंच से एक बड़ा वर्ग प्रदेश में अछूता रहता है।
एक बात यह भी साफ है कि इंटरनेट का उपयोग करने वाला शहरी वर्ग है जबकि रेडियो दूर दराज और दुर्गम का संचार माध्यम है। हालांकि एफएम ने शहरी वर्ग के बीच पैठ भी बनाई है।