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पेयजल शुद्घि में यह प्रयोग करने वाला पहला राज्य बनेगा उत्तराखंड

Tue, 29 Sep 2015 01:05 PM IST
नलिनी गुसाईं/ अमर उजाला, देहरादून
नलिनी गुसाईं/ अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 29 Sep 2015 01:05 PM IST
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drinking water will purify without chemical treatment.

उत्तराखंड देश का पहला प्रदेश बनने जा रहा है जहां स्वच्छ पेयजल के लिए बिना केमिकल ट्रीटमेंट के क्लोरीनेशन होगी।

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जर्मनी की टीम की ओर से जर्मन की लैब में किए गए परीक्षण को उत्तराखंड में अपनाया जा रहा है। इस विधि में पानी के अणुओं को तोड़कर क्लोरीन ली जाएगी। हरिद्वार में इस तरह का पहला वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगने जा रहा है। इस विधि के लागू होने के बाद गली-मोहल्लों से आने वाली गंदे पानी की शिकायतें दूर हो सकेंगी।

पानी को स्वच्छ रखने के लिए जरूरी है कि उसमें क्लोरीन हो। क्लोरीन ही पानी के बैक्टीरिया का खात्मा करता है। अभी तक जल संस्थान की ओर से पानी में क्लोरीन मिलाई जाती है। जिसकी समय-समय पर पानी की टेस्टिंग कर देखा जाता है कि पानी में कितना क्लोरीन है।
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अभी पानी में क्लोरीन तो मिला दी जाती है, लेकिन वह शुरू के मोहल्लों में पहुंच कर खत्म हो जाती है। इस पर कई संस्थाएं जल संस्थान में शिकायत कर चुकी हैं। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा, क्योंकि पानी से बना क्लोरीन पानी में ही होगा।
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ऐसा पहली बार है कि बिना केमिकल वाला क्लोरीनेशन होगा। जर्मनी से टीम उत्तराखंड आई है। मंगलवार को हरिद्वार के पंतद्वीप में जल संस्थान के अधिकारियों को यह विधि समझाई जाएगी। पंतद्वीप में ही पहला वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाया जाएगा। इस विधि में एक इलेक्ट्रोलिसिस के अलावा किसी चीज की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

इस तरह मिलेगा क्लोरीन

drinking water will purify without chemical treatment.

H20+cl2 = hcl+hocl
जल + हाइड्रो क्लोराइड = हाइड्रोक्लोराईड एसिड+ हाईपोक्लोराइड

इस तरह होगा क्लोरीनेशन
इलेक्ट्रोसिस से पानी के अणुओं को तोड़ा जाता है। इससे पानी में पहले से मौजूद क्लोराइड टूटती है तो ऑक्सीजन इसको सोख लेती है। इससे क्लोरीन पैदा होता है। यही क्लोरीन पानी में क्लोरीनेशन का काम करती है। इस विधि में ना तो किसी तरह का केमिकल इस्तेमाल होता है और ना यह महंगी पड़ती है।

देश में पहली बार बिना केमिकल के पानी का क्लोरीनेशन होगा। जर्मनी के विशेषज्ञों ने जब यह विधि बताई तो अच्छा लगा। उन्होंने उत्तराखंड आकर परीक्षण कर दिखाने को कहा। इससे पहले वह जर्मनी की लैब में परीक्षण कर चुके हैं। इससे फायदा यह होगा कि गली-मोहल्लों से यह शिकायत नहीं आएगी कि हमें क्लोरीन वाला पानी नहीं मिला। मंगलवार को हरिद्वार में इसका मॉडल लगेगा। राज्य में अन्य जगहों पर भी यह विधि अपनाई जाएगी।
- पीसी किमोठी, जीएम टेक्निकल

जर्मनी से यह विशेषज्ञ आए
प्रोफेसर थोमस ग्रिश्चिक- वॉटर डिवीजन हेड, ड्रेसडन यूनिवर्सिटी ऑफ एप्लाइड साइंसेस
सी संधु- रिसर्च एसोसिएट, ड्रेसडन यूनिवर्सिटी
डॉ. एच बॉर्निक- हेड, ड्रेसडन टेक्निकल यूनिवर्सिटी वाटर साइंसेस
डॉ. डब्लू स्मित- रिसर्च एसोसिएट, ड्रेसडन यूनिवर्सिटी
डब्लू सी वैगनर- सीईओ, वॉटर इलेक्ट्रिसिटी कंपनी

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